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Friday, December 31, 2010

नव वर्ष मंगलमय हो 
नव हर्ष मंगलमय हो
जीवन मे आयें खुशियाँ
'उत्कर्ष' मंगलमय हो !
सभी ब्लॉगर बंधुओं को नव वर्ष'२०११ कि हार्दिक शुभकामनायें.  
 

Tuesday, December 28, 2010

गाँव की पगडंडियों से गुजरते हुए सूझती है ये कविता, और मन भावुक हो उठता है, उन यादों को समेट कर  दिल के किसी कोने मे अंकित कर लेना चाहता हूँ! चाहता हूँ यह पल यहीं रुक जाय, पर ज़िन्दगी शायद ऐसे मे थम जाएगी, और..............


वो सोंधी सी खुशबू -
जब पानी की फुहारें ,
मेरे खेत की मिट्टी पर पड़ती हैं !
मदहोश कर जाती है-
महकते गुड़ की ख़ुशबू.
जब आंच पर पकते गन्ने का रस -
एक सुरमई रंगत लिए उबलता है !
याद आता है -
माँ का आंचल ,
जब धूप से जले
लाल,अंगार हुए गालों पर फेरती थी वो !
लेती थी बलैयां.
पोंछ देती थी 
सारी तपिश !
और चढ़ता सूरज भी 
जब हार जाता था 
उस आंचल की छांव-घनेरी से !
आज यह वैभव, यह ऐश्वर्य भी फीका है  
जब उन घड़ियों की याद आती है 
और मैं यह सोचता बैठा हूँ 
कोई लौटा दे मेरे -
वो बीते दिन ,
वे स्वर्णिम पल-छिन !

Sunday, December 26, 2010

बेसाख्ता छलक आये नीर नैनों से
तुमने जो मेरे  काँधे  पे हाथ धर दिया !
मैं तो यूँही बेचारा सरे-राह फिर रहा था 
तुमने मेरे धूप को साया कर दिया !

Wednesday, December 15, 2010

अच्छा लगता है अपरिचित होना !
दुनियां की भीड़ जब घेरती है, 
सवालों के दायरे मे!
जब अनायास ही कोई दुखती रग पर धर देता है,
खुरदुरा सा हाथ !
जब कर्कश ध्वनि रौंदती है,
कानो के पर्दों को !
जब परिष्कृता को पापिन की,
संज्ञा दी जाती है !
अच्छा लगता है तब
मन कहीं अमराइयों मे ,
गुन्तारे मे खो जाये .
ठंडी हवा  का मादक स्पर्श ,
हौले से टीसते घाव सहलाये .
कोकिल-ध्वनि मादकता लाये 
मन मयूर नाच-नाच जाये .
अच्छा लगता है!

Tuesday, December 14, 2010

कभी पली थीं खुशफहमियां तेरे आगोश मे 
अब तो गर्दिशे-बहार के दिन आ गये !

Friday, December 10, 2010

मन डरता है.
यह सोच कर कि क्या कभी हम उसे प्राप्त कर पाएंगे ,जिसके लिए प्रयासरत हैं, पर मन यह सोचकर भी तो डरता है कि जो हमने पाया है ,कहीं वो हमसे छूट न जाय  ! तो क्या परिणति है ,मन को डरने से रोका जाय या उसे समझाने का प्रयत्न किया जाय कि यह डर अनावश्यक है , और इसका कोई आधार नहीं है . हरिवंश राय बच्चन जी ने लिखा है 'अपने मन का हो तो अच्छा,अपने मन का न हो तो और भी अच्छा ',क्योंकि उसके लिए इश्वर ने कुछ न कुछ निर्धारित कर रखा है ! तो फिर मन क्यों डरता है. अक्सर महसूस करता हूँ मैं , एक बुद्धिजीवी जितना सशंकित रहता है अपने भविष्य को लेकर, उतना एक अनपढ़ मजदूर नहीं, अगर ऐसा नहीं होता तो आज जितने भी अनाचार , दुराचार या अनियमितताएं समाज मे व्याप्त हैं ,शायद उतनी नहीं होती. राह चलते शायद देखा हो आपने... एक बंजारन जितनी आश्वश्त होती है अपने भविष्य को लेकर,उतना एक पढ़ी-लिखी संपन्न महिला नहीं होती,मुझे लगता है, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उनमे एक डर शायद अपनी कमी को लेकर होता है. 
मन मे उठती -गिरती तरंगों, भावनाओं , उमंगों ...क्या कहें इसे ...खैर,  जो भी हो ... एक कविता की शक्ल बन रही है , नोश फरमाएं.........

कहते हैं -'अपने मन का हो तो अच्छा 
मन का ना हो तो और भी अच्छा !
जानता है मन 
मानता नहीं. 
उधेड़-बुन भी एक शगल है शायद !
मन-अक्सर उदास हो जाता है 
अक्सर बुनता है नए ख्वाब
कभी होनी ,कभी अनहोनी 
कभी अतिहोनी 
भी चाहता है मन!
मन-वश  मे नहीं होता 
मन ,अंकुश भी नहीं मानता
देवत्व  से दानत्व  की ओर
भागता है मन !
मन-अवश घोड़े सदृश भागता है
तोड़ता है नियमों की जंजीरें 
कभी अच्छा, कभी बुरा 
सोचता है मन !
नही मानता है मन 
विरोध करता है मन
मान्यताएं, रीतियाँ , संस्कार , रिवाजें 
तोड़ने को आतुर,
उत्प्रेरित करता है मन 
नहीं मानता है मन !
                बस यूँ ही .............!
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी !
तेरे जुल्फों की घटाओ से महक आएगी .
मैं जो तन्हा हुआ , तू भी तो पछताएगी
मेरे हालात से भी तू  तो  न बच पाएगी  
और तन्हा भी जो हुआ मैं तो, तन्हा न रह पाउँगा 
मेरी तन्हाई तेरी यादों मे बस जाएगी 
रुखसत ना कर अब ऐ,  इस गमे -दिल को
हर धड़कन से बस तेरी सदा आएगी !

Tuesday, December 7, 2010

उस्तादजी के ब्लॉग पर देखा चित्र इस कविता का जनक है , इसलिए यह कविता भी समर्पित है उस्ताद जी को ! 

पैर से पंचर बनाते हुए 
देखे नहीं होंगे 
किसी ने 
निशान !
जो उसके पैरों के साथ ही उभर  आये  होंगे 
उसके दिल पर!
तल्खियों मे डूबी चीख किसी ने नहीं सुनी होगी 
उसके मन की!
इज्ज़त की दो रोटी कमा ले ,
यह सोचकर -
कितने दर्द सहे होंगे उसने !
हिकारत से देखा होगा कितनो ने 
शायद कुछ ऐसे भी होंगे , 
जिन्हें सामयिक टिपण्णी नुमा दया आई होगी !
कुछ वे भी होंगे ,
जिन्होंने एकाध रूपये के लिए -
चिख-चिख मचाई होगी 
पर जो तन्मयता 
जो इमानदारी 
जो परिश्रम 
उसकी पेशानी की 
बूंदों को 
आयी होंगी .
क्या जवाब दे पाएंगे वे
जो सवारी करते हुए
ठंडी बयार पर 
आहें भरते होंगे !

Sunday, December 5, 2010

क्या लिक्खूं!
तुम याद आती हो !
या कि याद आती है 
उस घर की,
जहाँ तुम पोंछती होंगी
दीवार से सटे 
ताक़ पर लगाई हुई 
मेरी और तुम्हारी तस्वीर!
पूजा घर मे तुम्हारा 
बाती बनाना !
आरती की थाल-सुबह-शाम
सजाकर -
प्रज्जवलित लौ से घर को
प्रकाशित करना !
इश्वर से प्रार्थना करते हुए 
परिवार, बच्चों के
कुशल-मंगल की ताकीद करना !
या फिर -
घर से बाहर निकलते 
मंदिर मे माथा टेकना !
रसोई मे घुसकर 
हर-एक की फ़रमाईशों  पर
कुर्बान होना !
कभी खुद का नहीं -
पर बेटे-बेटियों के लिए
आश्वाशन मांगना !
क्या लिखूं
तुम याद आती हो !

Saturday, December 4, 2010

बहुत दिनों के बाद एक कविता पोस्ट करना चाहता हूँ. कविता क्या है , एक पुरानी याद है , जो घर के कोने मे दीवार से लिपटी पड़ी है. मै इसे हटाना भी नहीं चाहता . चाहता हूँ अपनी याद शेयर करुं.........................आपके साथ बाँट लूँ इसे.

खूंटी पर टंगा-
बाबूजी का कोट
एक सोंधी खुशबू
एक प्यार भरी डांट !
भविष्य को सचेत करती एक 
सलाह !
कितने सपने,कितने अरमानो
कितनी बेफिक्री, कितना सहयोग 
उन्मुक्त विचारों ,भावनाओं से 
उल्लासित मन !
नहीं जाना था तब
छूट जायेगा यह सब 
एक दिन !
'बाबूजी' बन जाऊंगा खुद मैं
नहीं जाना था तब 
उस गंभीर चेहरे का दर्द
नहीं सोचा था !
इतनी चिंताएं, इतनी विवशताएँ.
अब समझा है, आज जाना है 
उस कोट की बनावट मे
कितने रेशे- कितने सूत 
गूंथे हैं!
अब जाना है मैंने 
उस कोट की कीमत !

Wednesday, November 17, 2010

ज़िक्र हो ज़मी का ,या आसमां की बात हो
अब तो ख़त्म होती है वहीँ ,जहाँ तुम्हारी बात हो .
ज़िन्दगी मे मेरे अब है ही क्या तुम्हारे सिवा ,
अब तो बस तुम्ही तुम मेरी हयात हो .
हर वक़्त आँखों मे समाया है तुम्हारा ही अक्स
अब है किसे फिक्र ,कब दिन हो कब रात हो ,
रोशन हैं खुशियाँ इस ज़िन्दगी मे तब तक
जब तक तुम ,ज़िन्दगी के मेरे साथ हो !
                  --- रूप ---

Monday, November 15, 2010

कभी सोचता हूँ 'उन्मुक्त गगन मे पंछी बन उड़ जाऊं 
कभी फिरूं मैं सागर मे,औ बन मीन लहराऊं .
पर बेड़ियाँ पड़ी पांव मे ,कैसे मैं समझाऊं.
मैं मानव उलझा, सीमायें कैसे कर बिखराऊं !

Sunday, November 14, 2010

इस शहर के रास्ते अजनबी,
मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे 
मैं अकेला दूर तक चलता रहा
पर तुम हमेशा याद आते रहे .
रोज़ मरते रहे , रोज़ जीते रहे
ज़हर मिलता रहा, ज़हर पीते रहे 
हम,यूँ ही ज़िन्दगी को आजमाते रहे !
कोई नया ज़ख्म जब दिल पे लगा 
एक दरीचा ज़िन्दगी का खुला 
हम भी आदत डाल चुके ,
चोट मिलती रही, चोट खाते रहे.
पर वह  री आदमियत !
हम फिर भी,हमेशा मुस्कुराते रहे .
लोग मिलते रहे,लोग बिछड़ा किये,
हम भी कश्ती अपनी डुबाते रहे 
जब करीब आया किनारा कोई,
हम किनारे से दूर जाते रहे.
आप मिले थे ज़िन्दगी भर के लिए!
राह यूँ क्यूँ छोड़ जाते रहे !
वफ़ा का वास्ता जब भी दिया ,
तुम बस यूँ ही मुस्कुराते रहे 
रुसवा किया ज़माने ने हमें
हम अपनी ही लय मे गाते रहे 
'रूप' ज़िन्दगी कुछ इस तरह काटी 
रोज खोते रहे , रोज पाते रहे !
है गुज़ारिश, तुम पास बैठो हमारे 
डर है ,कहीं मैं खुद मे ही न खो जाऊं !

Friday, November 12, 2010

लगता है,पढने वालों की संख्या कम होती जा रही है, कमेंट्स ही नहीं आते , अरे भाई , कोई अच्छा नहीं तो बुरा ही कह दो , कमसे कम लिखने का एक मकसद तो जारी रहे ,या लगता रहेगा ,यूँ ही की- बोर्ड पर उँगलियाँ फेरते रहे , शब्दों के ताने-बने , जाले बुनते रहे , कुछ भी लिख मारा,और कोई कमेन्ट नहीं , लोग पढने के बाद भी, मुनासिब नहीं समझते की कुछ कह दो , बेचारे ने बड़ी धीरज से ये सोचकर लिखा होगा कि शायद किसी को तो पसंद आएगा ,कोई  तो तारीफ़ करेगा , चलो तारीफ न ही सही ,कोई बुराई ही कर दे, पर कमेंट्स पाने के लिए अब लगता है की लोबी बनानी पड़ेगी, कुछेक को पटाना पड़ेगा , गुहार लगाना होगा कि भाई मेरे,कमेंट्स लिखो , अन्यथा हम लिखना छोड़ देंगे.पर क्या हमारे लिखना ह्होद भर देने कि धमकी ! देने से कमेंट्स आना शुरू हो जायेंगे.या क्या कमेंट्स न आने पर हमारा लिखना प्रभावी हो जायेगा! हरगिज़ नहीं , पर ब्लॉग्गिंग के मठाधीशों की लोबी पर कोई न कोई असर तो पड ही जाना चाहिए . मुझे 'लगे रहो मुन्ना भाई ' का वह सीन याद आ रहा है , जब शिक्षक को अपना पेंसन लेने के लिए एक-एक कर सारे कपडे उतरने पड़ते हैं , और रिश्वतखोर मजबूर होकर  पंसन के पेपर्स पास कर देता है. ( कुछ लोगोंको शायद ऐसा भी आभास हो कि यह तो बेशर्मी कि पराकाष्ठा है ,कमेंट्स पाने के लिए ब्लॉग लिखना. पर अपने अंतर्मन मे झांक कर देखो , कहीं न कहीं हर ब्लाग्गर की यही ख्वाहिश है ,कि उसके लेखों पर कमेंट्स आये ,तो भाई मेरे इतना करो कि अब दनादन कमेंट्स लिख मारों , वरना एक ब्लाग्गर पनपने के पहले ही काल-कवलित हो जायेगा ! हा...हा....हा....हा.....हा.

Wednesday, November 10, 2010

एक शब्द/जो हमेशा ज़ेहन मे मेरे/उभरता रहता है,
लिए हुए एक गहरी ख़ामोशी/बेताब चीखने को.
शब्द /आवाज़ है/जो गले तक आकर बिंध जाता है /काँटों से .
कोशिश होती है/बाहर आने की,
पर.................
हर बार ही/बिंध कर/
लौट जाने के लिए ही शायद/
उभरकर आता है /
यह शब्द !
 

Tuesday, November 9, 2010

चलो, एक नया गीत बुने !
ख्वाबों के महल सजाएँ
रोशन जीवन महकाएं
जगमग हो घर -आँगन अपना
आशाओं के राग गुनें
चलो,एक नया गीत बुने !
तुम चंदा, मैं चांदनी
तुम ख़ुशबू ,मैं रागिनी
तुम,मीठी झंकार
और मैं, ताल और धुनें
चलो एक नया गीत बुने ! 
(समयाभाव... !जारी रहेगा ...)
बेफिक्री का वो आलम है कि न पूछो 
कब हुई शाम,कब सहर.खबर नहीं !

Sunday, November 7, 2010

माँ

तेरे आंचल की इस छांव  को ,
कब से रहा था , पुकारता 
पर, कौन था जो मुझे 
तेरी तरह दुलारता !
माँ- शायद आज समझा है,
मैंने तेरी, चाह को,
अब क्यों रहूँ मैं, भ्रमित
और किसी की राह को !
स्नेह-सिक्त , आँखें तुम्हारी,
ढूंढती हैं हर घडी ,
लाल की इक झलक को -
रहती रही -घन्टों खड़ी !
समझ ही पाया है कहाँ,
और क्या -समझ भी पायेगा 
ना भी पाकर प्यार तेरा ,
प्यार ऐसा पायेगा  !
दुःख-कष्ट, पीड़ा झेलती 
रहती ललन की याद मे.
आश्रित होती गर, कभी किसी के ,
तो,तात की फरियाद मे !
ठेस जो लगती -कभी,
पांव  मे उसके कहीं
पीड़ा भी होती कहाँ!
दिल मे ही तेरे, तो- तभी 
पर,किसने दिया है तेरी,
कुर्बानियों का  सिला  
सुनते आयें हैं -अब तलक
बेटे को माँ से है गिला !

Friday, November 5, 2010

दीप जलाओ, प्यार के !
जगमग हो संसार तुम्हारा,
घर-आंगन मे हो उजियारा,
खुशियों  का परचम लहराए 
गाओ गीत बहार के !
निर्धनता का अंधकार मिट जाये,
हर इंसां ,बस झूमे -गाये
दिग-दिगंत मे यश फैलाये
भारत मे हम जश्न मनाएं,
लोगों के अधिकार के !
सोने की चिड़िया कहलाये
खोये दिन हम वापस लायें.
श्रम के आज कसम हम खाएं.
जोत जगाएं संसार के !


दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं सहित.................


 

Friday, October 22, 2010

हो गई आज फिर -
एक डबलरोटी की चोरी!
चौराह पर खड़ा मैं,
भरवा रहा था जब-
गेहूं की बोरी.
तभी, एक उबाल उठा,
भीड़ दौड़ पड़ी -
एक चीथड़े से लिपटी अधेड़ पर
नोंच दिए चीथड़े उसके
सड़क पर पड़े -डबलरोटी के टुकड़े ,
और टुकड़ों से बड़ा फटा चिथड़ा !
विवैयां-झांकती चेहरे से ,
(शायद पैरों मे देखे हों आपने!)

जोश-भीड़ का ,सवाब पर
अपनी मर्दानगी का दम,
दिखाते हुए कुछ नामर्द !.

लो! पुलिस भी आ गई !
घसीट लिया 'चीथड़े को'
थाने तक!
लगे तमाचे, थप्पड़ ,लातें ,जूतें.
वाह री किस्मत !
देखा नहीं ,किसी ने 'पीठ से लगा पेट'
निस्तेज चेहरे पर जब -
हरकत हो गई बंद,
हवाइयां उड़ने लगी-
मर्दों के चेहरों पर!

एक जाबांज सिपाही-
बढ़कर आया,
थानेदार को ढ़ाढस  बधाया!
कोई नहीं सर!

'बीचोबीच सडक के डाल इसे
दुर्घटना का रूप देते हैं.'
संतोष की साँस ली
थानेदार ने !
भीड़ ने भी अपनी राह पकड़ी,
और देखा मैंने-
डबलरोटी के चीथड़े
सड़क पर !

Wednesday, October 20, 2010

यात्रा वृतांत

बलिया से इलाहबाद रेलगाड़ी से जा रहा था .रिजर्वेसन नहीं मिलने के कारण जनरल बोगी मे सवार हुआ. ज़ल्दी इतनी कि सफ़र के साथी अर्थात कोई रिसाला, समाचार पत्र,कोई पुस्तक भी नहीं खरीद पाया.खैर, ट्रेन मे अत्यधिक भीड़, किसी तरह अपने आपको ठूंसा और सामने ही ऊपर के बर्थ पर , जहाँ लोग सामान वगैरह रखते हैं, अपने आपको पटक दिया और सांसों को नियंत्रित करने का प्रयास भी ! तभी निचली सीट पर  शोर-शराबा शुरू ! देखता क्या हूँ , एक तरफ एक बुज़ुर्ग से सज्जन बैठे हैं , दूसरी तरफ एक नवयुवक और एक सभ्रांत से लगने वाले व्यक्ति उसी मे अपने -आपको ठेलने के प्रयत्न मे लगे हैं, पर उनके ठीक सामने के बुज़ुर्ग को आपत्ति है,और उन्होंने अपनी टाँगे अड़ा रक्खी हैं ताकि वे बैठ ना पायें, खैर किसी तरह उन सज्जन को भी स्थान प्राप्ति हो गयी .बुज़ुर्ग के साथ शायद उनका बेटा,उन्हें छोड़ने आया है, इसी बीच सज्जन ने कह दिया 'उम्र बढ़ने के साथ ज़रूरी नहीं की बुद्धि का विकास हो ही जाये' बस इतना सुनना था की बुज़ुर्ग के पुत्र , जो उन्हें छोड़ने आये थे, हत्थे से उखड पड़े और लगे गाली-गलौच करने , मार-काट की नौबत आ पहुंची . कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं, किसी तरह बीच-बचाव किया गया. ट्रेन चल दी, बुज़ुर्ग और सज्जन दोनों ही शांत हो गए . चूँकि मेरे पास खुद को व्यस्त रखने का कोई साधन नहीं था , मैंने सोचा आज यात्रिओं का वृतांत ही सुना जाय,और सफ़र इसी तरह काटने का प्रयास किया जाय .ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकी, कुछ यात्री चढ़े, कुछ उतर भी गए .मेरे सामने की उपरी बर्थ पर कुछ तीन-चार लड़के आकर बैठ गए, शायद कहीं कोई भरती वगैरह के लिए जा रहे थे. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उनमे चुहलबाजी शुरू हो गई और जैसा कि अक्सर देखा जाता है , उन सबों मे बड़ा आत्मीय (!)  सम्बन्ध था , एक दूसरे को रिश्तों मे संबोधित कर रहे थे, ( आप समझ ही गए होंगे!) बातचीत की शुरुआत कामनवेल्थ गेम्स से हुई , मुद्दा था -सरकार द्वारा कामनवेल्थ गेम्स पर अनायास  पैसों का खर्च. मुझे उनकी जानकारी और सरकार को सरासर कोसने पर आश्चर्य हो रहा था , उनके हिसाब से यह सब अनावश्यक था .और सरकार को इन पैसों का उपयोग किसी विकास कार्यों पर खर्च करना था. उनमे से एक इस बात पर असहमत था और कामनवेल्थ गेम्स  के आयोजन को सही ठहरा रहा था . थोड़ी ही देर बाद विषयांतर हो गया और मुद्दा बदल कर आरक्षण पर आ गया. कहने लगे , साले मादर..,(माफ़ कीजियेगा, ये मेरे शब्द नहीं हैं.) सरकार भी देश को डूबाने पर लगी है, अब देखो.. जनरल के लिए कम्पटीशन मे जहाँ १२० नम्बर चाहिए वहां एस-सी, एस-टी को साठे नम्बर चाहिए.आर्मी मे सीना भी कम्मे चौड़ा चाहिए , लम्बाई भी कम्मे होनी चाहिए. अबे अब साठ नम्बर वाला साठे लायक काम न करेगा....  अब मेरी समझ मे नहीं आया,मैं क्या करूँ , टिपण्णी करने की इच्छा तो हो रही थी , पर वे इतने सभ्य! थे कि हिम्मत नहीं कर पा रहा था. ( पर है यह सोचने वाली बात !) आपकी राय जानना चाहूँगा! यदि उचित समझें तो बताने का कष्ट करेंगे. थोड़ी ही देर बाद फिर विषयांतर हो गया,अबकी बात बदलकर क्रिकेट पर आ गयी, शुरुआत हुई धोनी महाशय से! अबे धोनिया  कुच्छोऊ  नहीं खेलता , साला(!) खाली पैसा कमाने मे लगा है , पहिले जब कैप्टन नहीं था तब अच्छा खेलता था . सचिनवा नै रहे तो इंडिया टिमे डूब जाय. अब मुझे उनकी बातों मे थोडा रस आने लगा था . मैंने उत्साह वर्धन हेतु कह दिया. सचमुच सचिन का मुकाबला कोई नहीं कर सकता ,पोंटिंग हो सकता है, सचिन का रिकार्ड तोड़े. बस, इसके बाद तो उन लड़कों की चर्चा क्रिकेट के सेलेक्शन से लेकर सचिन की जन्मकुंडली  तक चली. कहते रहे . पोंटिंग वा साला! बहुते बदमाश  है, पर सचिन का रिकार्ड कब्बो नहीं तोड़ पायेगा. सचिनवा मे जो पावर है , केतनो टूटेगा, फूटेगा लेकिन अन्दर आके दनादन शतक जोड़ देगा ! पोंटिंग वा का बापो ऐसा नहीं कर सकता है, वैसे भी उसका खेल ख़तम.और जानते हैं, इ सेलेक्टर लोग भी तो टेलेंट  को नहिये खेलने देगा . सब अपना भाई-भतीजा लोग को घुसता है , आइ प़ी एल  मे देखिये केतना अच्छा  खेलाडी लोग आया, सौरभ शुक्ल जैसा लोग. फिर , बात इंडिया -आस्ट्रेलिया वन  डे मैच पर आ गई. हरभजन का नया नाम! हरिभजन सुनने को मिला, बड़ा बढ़िया खेलता है , जरुरत पड़ने पर छक्को मारता है, लेकिन देखो,उसको भी नहीं छोड़ा सबब. अस्ट्रेलिया वाला भी उसको हटाने  के फेर मे मंकी वाला इल्जाम लगा दिया. एंड्रू साईं मंडवा भी पीछे ही लग गया था. चलो ई अच्छा हुआ की क्रिकेट बोर्ड थोडा ठीके ठाक रहा,नै तो हरिभजन्वा का भी कामे तमाम था. परिचर्चा या कह लें वार्ता चलती ही रहती पर इस बीच हम प्रयाग पहुँच चुके थे , मैंने अपना बोरिया -बिस्तर. अरे भैय्या , एक छोटा सा बैग ही था , उठाया और चल पड़े .

तमाम उम्र काटी है बुजुर्गियत  मे
कभी धूल से इक पत्थर तो चुना होता !

Saturday, October 16, 2010

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनायें !
विजयदशमी कि हार्दिक शुभकामनायें !
विजयदशमी, बुराई पर अच्छाई कि जीत. एक  ऐसा पर्व जो ना केवल नवरात्रि कि महिमा का बखान करता है, अपितु भगवान राम के रावण विनाश का भी बखान करता है, मान्यता है कि आज के ही दिन भगवान श्रीराम ने रावण का बध किया था और देवी सीता को लंका के अशोक वाटिका से मुक्त किया था . आज इस पर्व के पावन अवसर पर मै, आप सबको बधाई देता हूँ.और आपके सुखमय भविष्य की कामना करता हूँ. भारत जैसे देश मे , जहाँ विभिन्न प्रकार की जातियां, धर्म, संस्कृति न केवल जीवित है , बल्कि आपने समुच्चय रूप मे पुष्पित , पल्व्वित होती है  .किसी पर्व विशेष का उत्साह, किसी वर्ग विशेष तक ही सीमीत नहीं रहता, इसका असर पूरे समाज, और राष्ट्र पर पड़ता है. विश्व  के कई उन्नत देश जब आज  आन्तरिक कलह, द्वेष और विघटन के शिखर पर हैं , मुझे अपने देशवासियों को  एक सन्देश देना है. निम्नलिखित कविता प्रभाव डालेगी और यदि हम स्वतः इसका पालन करें तो निश्चित ही हमारे विकास का मार्ग प्रशस्त होगा.


विपदाएं तो आएंगी, सखा मेरे,
जब भी लोगे तुम, एक दृढ संकल्प.
ठोकरें तो लगेंगी ही राह मे ,
बनना चाहोगे, जब एक विकल्प.
नियति ने क्या कभी, 
मारी है ठोकर-
उस संत को,
भरा है जिसमे केवल आत्मबल !
यह आत्मबल ही पहुंचाएगा,
 तुम्हे शिखर तक,
तुम गर आज करो -एक संकल्प.
विकल्प तुम तो हो सकते हो
होगा ना कोई, तुम्हारा विकल्प !

Thursday, October 14, 2010

तल्ख़ होने से पहले,रिश्ते गर भूला दें तो !
महफ़िल के जगमगाते सितारें बुझा दें तो
तुम्हारे साये के मुन्तजिर क्यों रहें हम,
साये के नाजो-अंदाज़ ही मिटा दें तो !

चलो,रहमो-करम रहा तुम्हारा अब तलक
जियें तो ऐसे कि जिंदगानी गाती रही अब तलक
और देखो,किस कदर रुसवा किया ज़माने ने 
इस ज़माने के अस्तित्व ही भूला दें तो !

तुम ना सही कोई ना कोई तो है दिले बेकरार
किसी को रहता तो है हमारा भी इंतजार
तुम ना आये तो आ जायेगा कोई और भी
तुम्हारे इंतजार की शमा अब हम बुझा दें तो !



दिल की धड़कनों ने ली हैं अंगड़ाइयां 
एक पुराना ज़ख्म फिर से उभर आया है !

Wednesday, October 13, 2010

ये नीर ख़ुशी के, या गम के !

सपनीले नैनों मे तेरे
तिर आई घनघोर घटा  
ये नीर ख़ुशी के, या गम के !

झिलमिल तारे,चटका ये चाँद 
चहुँ और दीप्त है साँझ-विहान 
फिर भींगी क्यों तेरी पलकें !

कलरव करती,मदमाती सरिता 
उत्तुंग शिखर से गिर कर भी 
करती है देखो, मधुर गान
नयना तेरे हैं क्यों छलके !

तुझमे अभिहित है यह सृष्टि 
तू ही तू है है जग की दृष्टि
फिर काहे का गमगीन शमा
सूरज डूबे या चाँद ढलके !

Friday, October 8, 2010

वह रोता बचपन !

वह रोता बचपन!
धूल से अटा नंगा बदन,
फैलाये हाथ,कुछ बोलते,
आवाज़ मे तल्खी लिए
वह रोता बचपन!

आँख से बहते आंसू
गालों पर एक लकीर सी,
सूखी हुई कहती है ये
इन सांसों की कीमत नहीं.
वह रोता बचपन!

दिन खेलने के गोद मे,
तपती हुई रेत की मानिंद
जलती हुई धरा पर
फैलाये हाथ, कुछ बोलते
वह रोता बचपन!

(कविवर 'निराला' को श्रद्धान्जली स्वरुप) 
( निराला जी की स्टाइल से प्रभावित,'वह तोडती पत्थर'!)

Thursday, October 7, 2010

एक बेहद पर्सनल सी कविता: शायद आवश्यक है!

क्रोध हृदय का उमड़ा है,
मन को लगी है ठेस कहीं.
पर शायद यह दोष हुआ ,
शायद तुम्हारा दोष नहीं.
चंचल  मन की स्थिरता
झांको, देखो,परखो, समझो
परिणाम प्रेम का पाओगे
जब चखोगे,हृदय की कटुता.
आदर्शों के है,झंझावत,
या दोषी  मन की पीड़ा है,
नभ विशाल का प्रतिविम्ब  
या धरती की शीतलता है.
टकराकर- पर्वत शिखरों से ,
मेघों मे आई लघुता है.
शांत ह्रदय के सागर मे
दर्षित होता कहीं क्रोध नहीं..

क्रोध हृदय का उमड़ा है,
मन को लगी है ठेस कहीं.
पर शायद यह दोष हुआ ,
शायद तुम्हारा दोष नहीं.

Wednesday, October 6, 2010

स्नेह तुम्हारा!

 
स्नेह तुम्हारा,जीवन अमृत
स्वर्गिक,सुखकर,झंकृत-झंकृत
करता जीवन रस मधुर-मधुर,
होता मानव,उपकृत-संस्कृत.
मधुरिम,स्वर्णिम,हर क्षण सुन्दर 
लौकिक-अलौकिक,खिल-खिल कम्पित.
तार  हृदय के गाते गीत,
जीवन तरंग हर्षित-हर्षित .

Sunday, October 3, 2010

एक सन्देश  : प्रेम का !
यह सन्देश उन समुदायों को जो शायद अब समझने लगें हैं , कि नफरत केवल बंटवारा और क्लेश को जन्म देती है ,और अगर थोड़ी-बहुत कलुषता मन मे कही रह गई है , या कुछ तत्व उनमे दुराव पैदा करने का प्रयास कर रहें हैं ,तो मेरी गुज़ारिश को अपनाएं!


प्रेम से सींचो अंतर्मन को,
शांति ह्रदय मे पाओगे.
जीवन कि मधुरता का
आनंद भी तुम बिखरावोगे.

ध्येय अगर हो समता का
प्रकृति होगी स्वर्ग समान,
भटकोगे नहीं-मृगतृष्णा मे
आधार स्वछन्द बनाओगे.
प्रेम से सींचो अंतर्मन को....

अपार स्रोत से भरा हुआ,
तन-मन यह तुम्हारा है.
मरू-थल मे रह कर भी,
मधुमास नेह बरसाओगे.

प्रेम से सींचो अंतर्मन को .........( आगे और भी है...)

Saturday, October 2, 2010

एक कविता,बापू पर!

बापू-तेरी पुण्य स्मृति मे,
मन रोने लगा है फिर एक बार-
याद तू आने लगा है.

काश,तू होता यहाँ
विचरण करता इस धरा पर-
अवलोकित होते  तुझे -पाषाण ह्रदय !

बापू-राम राज्य की तेरी कल्पना 
धूमिल हो गई है आज,
कलुषित है ये देश- विकृत है ये धरा, 
लहू के सागर, बहते हैं अब!
बेटियां-नुचती हैं यहाँ -जब,
पूजें हम तुझे कैसे, कब?
तू ही बता -हम हैं कहाँ!

आ देख, फिर से एकबार
जिस धरा पर गिरे,तेरे लहू
-न्योछावर होने की खातिर,
उसी धरा पर-आज यहाँ,
कालिमा बिखरी पड़ी!

लहू भी तेरा, 
धूमिल पड गया-
इस 'कलुषित कालिमा' से
आ जा फिर एक बार-
बापू-ये दिल जाने क्यों आज,
ज़ार-ज़ार होने लगा है,
याद मे तेरी, रोने लगा है !

Friday, October 1, 2010

कटी पतंग-
दूर तक हवा के संग,
उड़ती चली जाती है  -
लहराती डोर ,
हवा के तेज थपेड़ों के बीच!

ना जाने कितनी उमंगें,कितने अरमां -
लेकर उडी थी यह,
वादा किया था,डोर के संग
साथ नहीं छूटेगा
आसमां के दूसरे छोर तक!

छोड़ा साथ-
मंजिल का नहीं है, 
कोई ठिकाना 
दूर तलक-
एक अंतहीन यात्रा
अनुभवहीन!
बस, थपेड़े ही बन कर
रह गयी-नियति.
क्या,कभी चाहा था- परिणाम ऐसा 
पर कौन है-जिसे कारण कहा जाय
तो आओ-फिर उड़ें,
शायद अबकी बार,
आसमां के दूसरे छोर तक 
हो अपना साथ!

Tuesday, September 28, 2010

आज  सोचा , एक नया नाम दूँ अपने  पोस्ट को, बड़ी देर लगी यह सोचने मे की कौन सा नाम उपुक्त होगा, आखिर ,अर्थ भी तो निकलना चाहिए ना ,किसी नाम का, तो 'अनुभूति' कुछ ठीक लगा. सच तो यही है, कि अपने जीवन काल मे तमाम अनुभवों को ही तो आखिर शब्दों का रूप दिया जा सकता है .(अगर लफ्फाजी ना की जाय तो,)खैर, उमड़ते-घुमड़ते विचार, विचारों का तारतम्य, वैसे कुछ चालाकी भी! हाँ, अपने लिए नहीं .पर मुझे कई बार लगता है, कि अधिकतर हम वो पढ़ते  हैं, जो पढना  नहीं चाहते ,अनायास ही! अभी-अभी दो ब्लॉग पोस्ट्स पढ़ी है मैंने, और मुझे लगा, समय बर्बाद कर रहा हूँ मै अपना, अब कोई छींके,तो ब्लॉग, कोई पा..  ,तो ब्लॉग. ये क्या है भाई, अरे कुछ ऐसा लिखें ,जिसका अर्थ हो, और कुछ नहीं ,तो भाषा का ही मर्म समझ मे आये, चलो, कई बार casual होना ठीक है, पर उसकी भी कोई सीमा होनी चाहिए.अब आप कहेंगें' किसी ने ज़बरदस्ती तो की नहीं, कि आप पढो ही' पर, कहा ना मैंने, कई बार अनायास ही ....... मैं अपने विचार थोप नहीं रहा हूँ, और यह भी सच है कि बुद्धिजीवियों के बीच एक सार्थक बहस की आवश्यकता ,अवश्यम्भावी है.तो फिर , क्यूँ ना कुछ ऐसा लिखे , जिसका समुचित अर्थ हो , जो झकझोरे, उद्वेलित करे , और मंथन के लायक हो .और कुछ नहीं हो तो संवेदनशील तो अवश्य हो, मैं जनता हूँ , सभी सहमत नहीं हो सकते मेरे इन भावों से. पर मुझे लगता है कि इस पर कम-से -कम एक सोच तो ज़रूरी है, आप क्या कहते हैं......?

Monday, September 27, 2010

क्या नाम दूँ,इसे!

वो चिर-परिचित,चिरनवीन मुस्कान 
तुम्हारे मादक अधरों की,
देखता है,पूनो का चाँद
तुम्हे क्या,खबर नहीं इसकी?


चांदनी,बिछी जाती है
तुम्हारे कोमल पैरों के तले
ये भोलापन,कहाँ से पाया है,
बताओ ना! ये अदाएं हैं किसकी
सांसों की महक -तुम्हारी.
जैसे खिल उठे अगणित चन्दन-वन
अधखिले अंगों का मधुमास!
अधीर होता है, पागल मन.
प्यास बढाती है,
महक,तुम्हारी वेणी की.


आओ ना, 
हाथों मे हाथ लिए,
हम दूर चलें.
मंजिल हो नई,
धूप हो तुम्हारे ,चेहरे का 
छांव हो,तुम्हारे आँचल की !

Saturday, September 25, 2010

रोटी !

रोटी- बता,कितने इंसानों का खून किया है तूने!
हैवान बनाये कितने,
मासूम बिगडाए कितने 
औ कितनो को सुकून दिया है तूने!


तेरी ही खातिर -
रिश्ते बदलते देखा,
इंसानों को जानवरों का
 मुखौटा पहनते देखा 
फिर भी, रूप तेरा है कितना सुन्दर !
कितनी है नादाँ 
है कितनी भोली,
तूने ही तो अपने लिए,बहनों की इज्ज़त तोली
बता-ये एहसास तो दिया है तूने
की तू मजबूत है बहुत!
बिन तेरे चल नहीं सकता 
ये  जहाँ !
अस्तित्व भी तो खोएगा-हर एक इंसां यहाँ
कितने अस्तित्व, खोने को मजबूर किया है तूने!
रोटी-बता , कितने इंसानों का खून किया है तूने!

Thursday, September 23, 2010

बाबूजी

आज पितृपक्ष की पहली तिथि को बाबूजी की याद आ रही है, और उन्ही को समर्पित है मेरा यह आलेख, क्योंकि आज मै जो कुछ भी हूँ,उन्ही की वज़ह से . मेरा ख्याल है कि इस बात से लगभग ८०% लोग सहमत होंगे, शायद गलत भी हो मेरा ख्याल.
बाबूजी बड़े गुस्सैल व्यक्ति थे , परन्तु इतना भर कह देने से उनके व्यक्तित्व का आकलन नहीं हो सकता, किसी भी व्यक्ति मे केवल एक ही गुण या अवगुण नहीं होता और समग्र व्यक्तित्व को जानने के लिए एकपक्षीय भी नहीं हुआ जा सकता.हम छः भाई बहन हैं , पांच भाई और एक बड़ी बहन. मैं सबसे छोटा हूँ और शायद बाबूजी को बहुत कम जान पाया हूँ , पर बाबूजी मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करते थे. 'प्यार'-उस सामाजिक व्यवस्था मे ,जब अपने बच्चों के प्रति लाड़ प्रदर्शित करना अपराध था और सामाजिक अवहेलना की दृष्टि मे आता था. खैर, बाबूजी को ऐसा  लगता था क़ि मै शायद जीवन मे सफल नहीं हो पाउँगा और इसलिए भी वे मुझे लेकर आश्वस्त नहीं थे. मुझे ,तब ज्ञान नहीं था क़ि जीवन मे कुछ बनने के लिए परिश्रम की ज़रूरत होती है, और मै अलमस्त जीवन के मज़े ले रहा था, हम दो सबसे छोटे, मैं और मुझसे दो-तीन साल बड़े मेरे भाई, समानरूप से मित्रता और शत्रुता करते हुए बढ़ रहे थे. मेरे भाई को फिल्मो का शौक था और मेरे कपड़ों, पेंसिलों,चप्पलों या यूँ कह लें कि मेरी नफासत पर उनका अधिकार दबंगई कि हद तक था. पिताजी हम दोनों  भाइयों  को साथ ही बिठाकर पढ़ाते. पढ़ाना कम और पिटाई ज़्यादा होती, क्योंकि हम बाल-सुलभ आदतों के कारण पढने मे कम और लड़ने मे अधिक रूचि लेते थे.बाबूजी बड़े सामाजिक व्यक्ति थे और लोगों पर उनका प्रभाव भी था , गाँव के लोग उनसे सलाह-मशविरा के लिए आते रहते और ये कार्यक्रम हमारी उपस्तिथि मे होता,क्योंकि हम वहां पढाई के लिए मौजूद होते.पिताजी तब बड़े सामाजिक और जागरूक हो जाते थे. और घर मे माँ और भाभी कि शामत!(उन्हें चाय जो बनानी पड़ती थी ),उस समय हमें लगता था , बाबूजी कितने शांत हैं,अब समझ मे आता है, जब मेरे बच्चे बड़े हो रहे है, कितना सार्थक था ,बाबूजी का गुस्सा ! बाबूजी ,जब तक रहे उनका ठसका कभी कम नहीं हुआ, बुढ़ापे मे भी , जब वे अशक्त हो गए, और बिस्तर पकड़ लिया,तब भी उनका स्वाभिमान कम नहीं हुआ,और अशक्त होते हुए भी उन्होंने हमेशा स्व-धीन ही रहना चाहा . आज बाबूजी कि सीख,मेरे मन-मस्तिष्क मे जीवंत है, 'कभी भी स्वयं की नज़रों मे गिरने वाला काम न करो! 'बाबूजी का स्वर्गवास ०९ अक्तूबर २००९ को उस वक़्त हुआ जब मै All India Radio इलाहबाद अपनी रेकॉर्डिंग के लिए जा रहा था,और जैसा कि बाबूजी का आदेश था, अपने वर्तमान को कभी भी भविष्य के लिए न टालो , मैंने भी रेकॉर्डिंग पूरी कि और तभी उनकी अंत्येष्टि के लिए गया!
फ़िलहाल यही श्रधान्जली है मेरी, हमारे बाबूजी के लिए..........बाकी फिर कभी.................

मै रो पड़ा था!

तुम्हारी वाणी -भादो की उछ्रिन्खलता ,
मन मेरा गाने लगा था 
तुम्हारे ह्रदय मे पूर्णता ढूंढ रहा था मै!
विलीन-पूर्व मुहूर्त की वो स्मृति,
नभ के तारे भी जब क्लांत थे 
तुमने मुझे अभय दिया था !
उच्छवासित आवेग से-
काँपा था मेरा मन,
फिर भी पूछा था मैंने -तुमसे,
तुम-कितनी समर्पित हो,मेरे लिए!
'सम्पूर्ण' तुमने कहा था 
ऐसी पूर्णता, किसी ने न दी मुझे-
मै रो पड़ा था! 

कभी तो पूछो हाल हमारा.............


कभी तो पूछो हाल हमारा,
कभी तो हंस कर बातें कर लो!
माना हम,नहीं प्यार के काबिल
रंगीं इक सौगात तो कर लो!
कभी तो पूछो हाल हमारा......

खातें रहें हैं, कसमे तुम्हारी 
दिन हो खाली,या रातें भारी
तिरछी चितवन,हम पर डालो 
दे दो इक रुमाल ही प्यारा
कभी तो पूछो हाल हमारा.........

आओ भींगें, रिमझिम बूंदों मे 
मन,तन औ जीवन हर्षाएं 
एक-दूजे के साथी होकर
बुनें एक प्यारा,जाल सितारा
कभी तो पूछो हाल हमारा........

लहराते गेसू तुम्हारे,
तुम जो आये पास हमारे
गुंजित कर,मन-उपवन को,
महकाया संसार ये सारा
कभी तो पूछो हाल हमारा..........!

Monday, September 20, 2010

एक सच से मेरा सामना !

उस मुर्गे को हलाल करते हुए-
उसके चेहरे पर उभरे तनाव देखकर 
मैंने पूछा !
क्यों इतना जोर लगा रहे हो भाई!
यह तो साधारण मुर्गा है-
हलके रेतने से ही काम बन सकता है.
उसने कहा-छोडो साब,हमारा जोर तो इसी पर चल सकता है.
पता नहीं क्यों , मुझे उस कसाई लड़के के बारे मे जानने की तीव्र इच्छा होने लगी.
पता चला --- नया, नया है, धंधे मे!
परिवार मे कोई नहीं! 
पहले कहीं घरेलू नौकर था,
पता नहीं-कहाँ!
खैर, पूछा मैंने-काम करोगे!
देखा -उसके चेहरे पर कोई उत्सुकता नहीं,
कोई संतुष्टि भी तो नहीं थी-चेहरे पर उसके!
'जवाब नहीं दिया'
मैंने फिर पूछा!
वही तटस्थ उत्तर !
छोडो न साब!
तुम क्या काम दोगे!
बाज़ार से सब्जी लाने  पर चोर कहोगे 
टी.वी देखने पर माँ की गाली दोगे,
पंखे के नीचे बैठने पर- पुरखों का मेरे तर्पण करोगे!
रहने दो! मैं यहीं ठीक हूँ .
सोचता लौट आया मै-
क्या वह  सही कह रहा था! 

Sunday, September 19, 2010

roop_theblogger: मै हूँ !

roop_theblogger: मै हूँ !: "सखा मेरे ,मुझे पाओगे तुम-नग्न शिशुओं की भीड़ मे ,मैं वहीँ हूँ ! प्रेम के मंदिर मे,तूफ़ानो के परिचित जगत मे,प्रतिदिन तुम्हारे व मेरे-सुखी दिन..."

kaise prakat karen apne udgar, jabki bandishen hazaron hai zindagi ki.ab to karar pane ko bekarar hain, chain shayad hi payenge kabhi..........................

Saturday, September 18, 2010

बूँदें बहार की!

खिडकियों से झांकते अक्स-
रिमझिम बूँदें बहार की,
चिथड़ी धोती से लिपटा
एक बुढ़ापा! 
न जाने किन ख्यालों मे है -
ये जहाँ,
कि हम खुशहाल हैं 
सोने कि इस धरा पर.
पर, जो निकाल रहे हैं ,
सोना, इस धरती का-
क्या उन्हें पत्थर भी है उपलब्ध 
एक घर बनाने को?
क्या,लकड़ी मयस्सर है उन्हें ,
बनाने को एक खिड़की,
और झाँकने को-
रिमझिम, बूँदें -बहार की!


Thursday, September 16, 2010

मैंने भी बहना सीख लिया

मैंने भी बहना सीख लिया
पानी के इस रेले मे ,
जीवन की आपाधापी मे
मैंने भी ढहना सीख लिया.

जब कभी नज़र फेरा मैंने
विगत भूत था चुपचाप खड़ा
पढने का करता हुआ प्रयत्न ,
जीवन के किंचित आखर को
ठेला इसको,उसको खींचा 
बढ़ जाऊं  मै आगे की और
पर रहा खिसकता हरदम मै 
छोर कोई, पूरा ना मिला 
आखिर,छोड़ा प्रयत्न अपना 
धेले मै ढहना सीख लिया 
जीवन  की आपाधापी मे
मैंने भी बहना सीख लिया 

क्यूँ करुं कोई, शिकवा या गिला 
कर सकता था जो,वही किया
नियति ने जो कुछ रक्खा था 
बस था मेरा और मुझे मिला .

बस हुआ यही पूरा सपना
सपने मे जीना सीख लिया
जो मेरा था , पाया मैंने
बाकी न कभी कोई भीख लिया 
मैंने भी बहना सीख लिया.......








Tuesday, September 14, 2010

डोलो ना !

यादों के भंवर से उबरो ना ,
चुप न बैठो,कुछ तो बोलो ना 
कलियाँ, चमन मे खिलखिलाती हैं,
तुम भी मन के द्वार खोलो ना !

जो बीत गया वो सपना था,
जो साथ है अब, वही सच है
तुम संग रहे,गमगीनी के,
बहारों के संग अब हो लो ना!

पंछी भी शोर मचाते हैं,
नव सुर मे तुम्हे बुलाते हैं
लहराओ,गाओ इनके संग
इस नव सुर मे तुम डोलो ना!  

जो पाया तुमने,वो सुखकर था 
जो खोया, भूलो उसे अभी 
जो बीत गया,वो सपना था 
जीवन मे उसको तो, लो ना !
                              -रूप  

बधाइयाँ व शुभकामनायें.

हिन्दी दिवस कि ढेरों बधाइयाँ व शुभकामनायें..............

सरोकार !

मैंने अक्सर ये शब्द सुना है , मेरा कोई सरोकार नहीं है इन बातों से, और फिर मैं सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ , क्या सचमुच!, क्या सचमुच,हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं , कि कुछ बहुत सी महत्वपूर्ण बातों का हमसे कोई सरोकार नहीं होता, घर मे , कार्य के दौरान , मनोरंजन करते हुए, यहाँ तक कि आराम फरमाते हुए भी हमें सरोकार होता है, अपने आसपास के वातावरण से... और फिर भी महज़ औप्चारिक्तावस या यूँ ही हम कह देते हैं , हमारा कोई सरोकार नहीं है. मेरे एक परम मित्र हैं, मेरे साथ ही कार्यरत, बड़े ही सज्जन और बुद्धिमान . उम्र के तीसरे पड़ाव पर आकर, जैसा कि स्वाभाविक है ,थोड़े दार्शनिक और भगवद्भक्त हो गए हैं, पर वास्तविकता इसके इतर है, और कभी-कभी मुझे लगता है (वैसे ये मेरी व्यक्तिगत सोच है!)  के सचाई यह नहीं है , और जैसा कि व्यवहार से भी परिलक्षित होता है,
सरोकार सामाजिक कैसे हो पायें जब तल्खियाँ यूँ बढती जातीं हैं!
तुम कहते हो, है ये दुनिया का दस्तूर _पर क्या वो जिस्म जो जुदा हुआ ,कहीं पहले भी जुड़ा था .
मेरी गुज़ारिश थी ,ये ज़माना शायद कभी तो  समझ पायेगा , 
पर उफ़, ये ख्वाहिशें तो खाली दामन छू कर लौट आयीं.
इल्तिजा है ,ये मेरी उन हवाओं से , जो तुम तक भी ले जातीं हैं संदेशा प्यार का, 
पर रह गए टूटे अरमानों से ,.ये इल्तिजा भी यूँ ही बेआवाज़ होकर रह गयी.
खैर................. मैं कवि-ह्रदय होने के नाते अपने उदगार इन शब्दों से प्रकट करूँगा. पसंद आये या न भी आये तो भी, अपनी राय मुझे अवश्य दें, क्योंकि, मैं भी थोडा confuse हूँ...! उदगार पढ़ें!


कल शाम ही तो,मिला मुझसे-
भूत मेरा !
कहने लगा  -यार तुम नहीं सुधरोगे! 
पूछा मैंने-क्यों भई !ऐसा क्या कर दिया है मैंने.
कहने लगा-
यार, तुम न तो  चरण स्पर्श करते हो, 
ना ही करते हो-स्तुति गान,
तुम्हारा तो बस-
'परनिंदा' व आलोचनाओं मे ही रहता है ध्यान.
देखो, समझो, सीखो,
संसार के विधान को.
यदि चाहते हो उचाइयां छूना ,
तो, छोडो आलोचनाओं के ध्यान को!
रम जाओ,मक्खन लगाओ .
हो सके -नहीं-नहीं!
हो या न हो-पर,
कव्वे को हंस बताओ.
यार, तुम्हारा बिगड़ ही क्या जायेगा 
तुम्हारे कहने भर से -कव्वा तो हंस नहीं हो जायेगा.
हाँ, पर इतना अवश्य है -कि तुम ,
परेशानियो से बच जाओगे ,
धूनी रमोगे,
और!
बिना'हींग लगे न फिटकरी'
'चोखा ही चोखा' कहलाओगे!
                                    -रूप'
 

मैं और शब्द !

किताब के लिखे हर्फ़-
अक्सर पूछते हैं मुझसे,
'क्या है कसूर हमारा'!

कभी तुम हमें बनाते हो ,
आंसुओं का सवब,
कभी ये चेहरे के शिकन 
बन जाते है!
कभी 'गमगीनी' के बादल-
तो कभी , आशाओं के सौगात लाते हैं! 
खिलौनों के चाबीओं की मानिंद ,
उमेठ देते हो,कभी तुम!
कभी-गिरा देते हो फर्श पर,
तो कभी 'अर्श' के सितारे बना देते हो 
हम-केवल मनोरंजन के सामा हैं ,
तुम्हारे लिए !

मैं कहता हूँ-भाई मेरे,
तुमने ही तो जहाँ बनाये हैं ,
ख्वाब पूरे किये तुम्ही ने-
तुम्ही ने आशियाँ बसाये हैं.
तन्हाइयों को राहत दिया है,
तुम्ही ने .
तुम्ही ने तो ,
'इंसां' बनाये हैं!

हर्फ़ का एक टुकड़ा -
मुस्कुराता है.
फ़िलवक्त खेल रहे हो, तुम हमसे,
उकेरते हो अक्स हमारा -
कठपुतलियों की मानिंद -
खेंच देते हो डोर हमारी ,
और,
ढील देकर ,कभी हमें पुचकारते हो!

फिर वही ,शिकवा -वही शिकायत,तुम्हारी!
हम नहीं हैं, खेंचते  डोर ,
तुम ही हमें बांध लेते हो,   
उँगलियों को हमारे,
देते हो जुम्बिश,
'अक्स ' अपना ,खुद ही-
बना लेते हो!


Monday, September 13, 2010

आज मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ, कहानी तो सामयिक भी हो सकती है, और हो सकता है कि आपको ये कुछ पुरानी या सुनी हुई सी प्रतीत हो . पर है खालिस उपयोगी .और present scenario को suit भी करती हुई , तो चलिए अब देर नहीं करूँगा और आपको कहानी की और सीधे -सीधे ले चलता हूँ , अरे, अरे , भई ..पहले माफी तो मांग लूँ , अगर कही ,किसी मोड़ पर मैं  hinglish  हो गया तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा, क्यूंकि, खालिस हिंदी लिखना या पचाना  आजकल के फैशन मे नहीं है;तो साहब कहानी कुछ यूँ है...
किसी एक राज्य मे एक राजा था , अरे भई, ज़ाहिर सी बात है, राज्य है तो राजा भी होगा. तो खैर, राजा बड़ा ही न्यायपूर्ण, सदाचारी और God fearing था! (ओह.हो .फिर वोही हिंगलिश.). उसके राज्य के सभी लोग बड़े ही खुशहाल और संतुष्ट थे. पर जैसा की हमेशा से होता आया है, ऊपरवाले को कुछ उल्टा सा सूझा और लो, राज्य में अचानक भयानक सूखा पड़ गया.  पेड़- पौधे, पशु -पक्षी , दानव-मानव! , जंतु-जानवर, सभी  परेशान, दुखी और बेहाल.  राजा , चूँकि दयावान और न्यायप्रिय था , उसने राजकोष मुक्त हस्त से खोल दिया , गरीबों का पेट भर गया, और गरीबों से ज़्यादा दबंगों का !(अरे भई, सलमान खान का नहीं) , भटक मत जाइये , कहनी का आनंद लेना हो अगर, तो थोड़े कम शाब्दिक होइएगा.. हाँ, तो , लोग संतुष्ट हो गए , और उपरवाला निराश ! फिर कुछ दिन बड़े आनंद से बीते, और फिर ऊपरवाले को परेशानी हो गयी, (आखिर उसे भी तो काम चाहिए!) तो जनाब, उसने इस बार खूब बारिश की, इतनी, इतनी और इतनी, क़ि भयानक बाढ़ आ गयी . लोग फिर परेशां, राजा के पास पहुंचे, राजा से गुहार लगाई पर इस बार राजा नहीं पिघला. राज्य मे भयानक अशांति का वातावरण फ़ैल गया, लोग एक-दूसरे को लूटने लगे, सौहाद्र और शांति का ह्रास (कुछ ज़टिल हिंदी तो नहीं है न! ) हो गया, ..रानी से रहा नहीं गया, उसने भी राजा से विनती की , पर राजा को न तो पिघलना-पसीजना था , न पिघला,न ही पसीजा . 
राज्य में एक शिक्षक रहता था, उसने अपनी और से प्रयास किया और , पता लगा ही लिया . उसको  पता चला  कि राजा तो वही था , पर सूखे के दौरान उसका मंत्री था -तोता, और अब इस भयानक बाढ़ के समय मंत्री हो गया है -कोव्वा !. तो ज़नाब , अब मैं इस कहानी को यहीं समाप्त करता हूँ और आपसे इजाजत लेता हूँ. पर रुकिए.. मेरे एक प्रश्न का उत्तर अवश्य देने कि कृपा करियेगा! ...कहानी सामयिक है या असामयिक........................................! और क्या , राजा सचमुच राज्य का उत्तराधिकारी बनने के काबिल था !