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Tuesday, April 29, 2008

तुम

खिलती कली सी _जूही की

मदिरा के छलकते प्याले सी

तबस्सुम लबों का तुम्हारा_

रूप कवितावों सा तुम्हारा

समर्पित हर लक्ष्य को शायद ,

ऐसा कर सकते हो -

तुम ,सिर्फ़ तुम ही,-साथी मेरे

Monday, April 28, 2008

आत्मबल

विपदाएं तो आएँगी _सखा मेरे
जब भी लोगे तुम एक दृढ़ संकल्प
ठोकरें तो लगेंगी ही राह मे
बनना चाहोगे __जब एक विकल्प
नियति ने क्या ___कभी मारी है ठोकर !
उस संत को ,भरा हो जिसमे __केवल
___आत्मबल ____
ये , आत्मबल ही तुम्हे पहुँचायेगा
शिखर तक !
तुम अगर आज करो ____ एक संकल्प
विकल्प _तुम तो हो सकते हो
होगा न कोई , तुम्हारा विकल्प .....

शब्द

एक शब्द/ जो हमेशा /जेहन मे मेरे /उभरता रहता है।
लिए हुए एक गहरी खामोशी/बेताब/ चीखने को/
शब्द ..../आवाज़ है।
जो गले तक आकर /बिंध जाता है / काँटों से ./कोशिश / होती है कभी ,परन्तु ............
हर बार ही /बिंध कर/ लौट जाने के लिए ही शायद /
उभरकर आता है/
वह ................................ शब्द ।

Sunday, April 6, 2008

सुनो

सुनो, कि बहरे नही हो तुम

होती हैं यहाँ बुराईयाँ

`निरपराध को अपराधी `
सिद्धा करने की साजिशें !

देखो, के अंधे नहीं हो तुम,

अत्याचार- समर्थ का असमर्थ पर

बुराई की अच्छाई पर होती जीत !

महसूस करो - के स्नायु तुम्हारे शिथिल नही हुए -अब तक

पीसती

हुई क्रूरता को .

उस असहाय ,आश्रित `नामानव `को ???

पर क्यों?

क्यों सुनोगे तुम !

तुम्हारे कान तो

गुलाम हैं

राग

रागिनियों के

तुम्हारी

आंखों ने!

चढा रखी है

रंगीन

मोटी
परत

और तुम्हारे स्नायु!

वे तो

मात्र काम के लिए उत्तेजित होते हैं !

---रूप ----