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Monday, March 21, 2011

कल  की  अनुभूति  का एक चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ . आप चाहें तो  इसे सराह भी सकते हैं...............आपकी टिप्पणियां आमंत्रित हैं !




तिरछी चितवन, भींगा तन-मन 
महका -महका सा है मधुवन 
छलके है मृदु-प्रेम तुम्हारा 
आह्लादित होता है जीवन !

आज सरस है नेह तुम्हारा 
कलकल बहती जीवन -धारा
जी करता है , डूबूँ इनमे 
कर दूं अपना जीवन -अर्पण !

तुम जो आये ,सावन आया 
प्रेम-सुधा का रस बरसाया 
छुन-छुन, छन -छन बजे पायल 
गुंजित हुआ आज घर -आंगन !

तिरछी चितवन, भींगा तन-मन
महका -महका सा है मधुवन !

5 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

श्रृंगार रस से परिपूर्ण सुन्दर रचना

वन्दना said...

भावो का सुन्दर प्रवाह्।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

सारा श्रृंगार रस कविता में उँडेल दिया है... लगता है प्रेयसी रंगों की फुहार में सराबोर हो न हो.. आपके शब्दों की बौछार में अवश्य भीग जाएगी!! और तस्वीर पर बस :)

Patali-The-Village said...

श्रृंगार रस से परिपूर्ण सुन्दर रचना| धन्यवाद|

रूप said...

आप सभी का धन्यवाद, जो आप मेरे ब्लॉग पर आये और मेरी रचना पर टिपण्णी कर मुझे उपकृत किया . आपके स्नेह का आकांक्षी !