Pages

Sunday, December 18, 2011

कई बार दिल ने चाहा
मजलिसों के हमराह न हों 
पर ख्वाहिशें कुछ ऐसी बढीं 
हम बारहा मजलिस हुए   !

Sunday, December 11, 2011

ख्वाहिश !

कोई रोज़ आता है , सपनो में मेरे
चुपके से कानो में कह जाता है ,
ढेर सी बातें
बातें , जो बेमानी नहीं होतीं
बातें , जिनका सरोकार होता है ,
जीवन की तल्खियों से , खुशिओं से
रुसवाइयों से ,शहनाइयों से
बातें ,जो कह जातीं हैं,
चुपके से कानो में
कल आएगा , एक दिन ऐसा
पूरे होंगें, ख्वाब तुम्हारे
सपना सच हो जायेगा
नए समाज की सादगी,
अठखेलियों में.
सपना , तुम्हारा  मुस्कुराएगा  !

Wednesday, December 7, 2011

बीत गया !

एक और बरस बीत गया 
जीवन घट रीत गया 
साथी और मंजिल यूँ ही मिलते गए 
संकट -विकट कट ,पीट गया 
चाहा था छूना आसमान मैंने भी  
कुछ पहुँच पाया , कुछ गीत गया 
मेरा तो कुछ भी अपना न था 
जो तुमने दिया वह मीत नया  !
मेरे मन की पीड़ा हर ली 
संग तुम्हरे , पल नवनीत नया .
एक और बरस बीत गया 
जीवन घट रीत गया !

Wednesday, November 9, 2011

चार दृश्य !

                      दृश्य -१
अब तो सुविधा संपन्न है जिंदगी !
मम्मी की आँखों में पानी है,
"बालिका बधू "की दुर्दशा देखकर 
कोसे जा रहीं हैं 'जगया' और 'माँ सा' को 
बेटा पिछले कमरे से चिल्लाये जा रहा है 
शायद किसी कीड़े ने काट खाया है उसे !
                     दृश्य -२
कल रात  की सब्जी फ्रिज से निकाली गयी है  
पति महोदय नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं 
शायद फंफूद लग गई है सब्जी में 
पत्नी का तीखा स्वर 
फ्रिज चलाने का क्या मतलब
जब चीज़ें ही न रखी जाय उसमे 

                   दृश्य -३
बेटी रुआंसी होकर स्कूल से लौटी है 
आज मैडम ने बड़ी इन्सल्ट की थी 
होम वर्क पूरा नही हो पाया 
कैसे करूँ मम्मी 
डांस क्लास्सेज,फिर गिटार
और 
कल वो शाहरुख़ की फिल्म भी तो 
आ रही थी टी.वी पर !
                   दृश्य -४
मुहल्ले  में कुछ चार-पांच लोग इकठ्ठा हैं 
चर्चा चल रही है इस बार के गणपति-उत्सव पर
कितने गरीब बच्चों को भोजन-कपडे करवाना है 
शर्मा जी ,फेसबुक  पर डटे 
फ्रेंड्स रिकुएस्ट भेजकर संख्या बढ़ा रहे हैं 


बाकी आपके  लिए छोड़े दे रहा हूँ , वैसे और भी है पर, इतने का ही मनन करें ................और .............!

Sunday, November 6, 2011

यूँ न इठलाओ !

मदहोश हवाओं में यूँ न फैलाओ आँचल 
बादलों के बरसने का अंदेशा हो जायेगा  !
रुखसार की लाली , इन्द्रधनुष का देती है गुमां  
बेहोश जवानी को मचलने का अरमां हो जायेगा !
गुनगुनाती वादियाँ हैं  , महकती  है ये फ़िज़ा 
यूँ न इठलाओ , धरा  को भी बहारा-जश्न हो जायेगा !
कायनात रंग बदलने को लगती है आतुर 
ज़ुल्फे -इकरार को  भी बयार का गुमां हो जायेगा !  

Tuesday, October 25, 2011

दीपावली


दीपावली की असंख्य लड़ियों की जगमग आपके लिए सौभाग्य लेकर आये , इन्ही शुभकामनाओं के साथ यह छोटी सी कविता प्रस्तुत है ....


खुशियों की दीवाली आई
मन में नई उमंगें लाई

दीप जलाओ, ख़ुशी मनाओ
घर-आंगन को तुम महकाओ
आओ मिल-जुल मंगल गायें
तन सरसायें, मन हर्षाएं
 जीवन को झंकृत कर जायें 
दीपों ने है ज्योति जगाई

खुशियों की दीवाली आई !

ज्योति से ज्योति जगाते जाओ
रोशन कर दो , हाथ बढ़ाओ
झूमो-नाचो , मौज मनाओ 
प्रेम की तुम सौगातें पाओ 
लक्ष्मी ने है अलख जगाई 

खुशिओं की दीवाली आई  !
   

Monday, October 24, 2011

आप सब को दीपावली की कोटिश: शुभकामनाएं !

Sunday, October 23, 2011

watch live cricket.

This blog is inviting you to watch live cricket , if u r devoid of ur T V, u can have my company here with full xpertise................!

Tuesday, September 20, 2011

एक अधूरा सपना !

कल सपने में देखा था 
एक हसीन भारत / एक खुशहाल भारत ,
हरी-भरी धरा से आवृत 
लहलहाती फसलें, प्रसन्न किसान 
खिलखिलाते बच्चे 
आश्चर्य !
देखा था मैंने , देश के नेता 
फूस की झोपड़ी
गोबर लिपे आंगन में
अपने अनुचरों के साथ 
चर्चा में लीन हैं !
देखा मैंने , अद्भुत दृश्य !
माताएं अपने नौनिहालों के साथ,
अठखेलियाँ कर रहीं हैं 
दूर कहीं हवा में विलीन 
रामचरित मानस के दोहे ,
अजान की आयतें 
चर्च की घंटियाँ
सुमधुर संगीत से आबद्ध !

पाठशालाओं में 
बच्चे समवेत स्वरों में
आह्वान करते हैं !
करते हैं माँ सरस्वती की वन्दना 
गुरूजी के चेहरे पर दिव्य तेज़ है !

सड़कों पर /गाँव के बैलों की घंटियाँ 
लय-ताल युक्त गीत 
और, हाट में गाँव के / कोई मोल-भाव नही !
चहुँ और शांति व्याप्त है 
शांति, जो सुखकर है 
समृद्ध है
वंदनीय है !

बगिया में,कोयल का सुमधुर राग 
पुरवैयों से झूलतीं  डालियों का फाग 
तलैया में श्वेताम्बरों की जाग
देखा था मैंने, कल सपने में !

टूट गया ! /शोर इतना था बाहर/आंख खुली 
तो देखा / पानी की कतार में/ बर्तन लड़ने लगे थे !

Tuesday, September 13, 2011

बधाई !

आज हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर आप सभी ब्लोग्गरों को बधाई.हिंदी की सेवा करते रहिये , यह भारतीयता का पर्याय है ! और इस छोटे से विचार को अपनी सहमति प्रदान करें !


हिंदी एकता है !
हिंदी एक विचार है !
हिंदी विनम्रता है !
हिंदी एक संस्था है !
हिंदी एक सभ्यता है !
हिंदी संस्कार है !

Wednesday, September 7, 2011

अब तो सुधर जाओ!

    
पाकी , सुधरोगे  नहीं तुम! 
फितरत नहीं है तुम्हारी
सुधरने की !
बारूद के ढेर पर बैठे ,
अपनी ही चश्म से  
देखते हो तुम
दुनिया को !
ज़िल्लतें , सौगात हैं 
तुम्हारे लिए !
 इंसानियत का पाठ 
 तुम नहीं पढ़ पाओगे !
 कितनी बार, कितनी ही बार
पीटे गए हो तुम,
पीठ दिखाकर  भागे भी ,
पर फिर वही .........
ये जो निर्दोष मानवता का
 खून तुम करते हो
 क्या हासिल है, तुम्हे !
 शायद यही सीखा है
 तुमने , क़ि तुम अशांत रहो 
 और रहे सारी दुनिया भी !
 कितनी ही, कोशिशे
 ज़ाया की हैं
तुमने.  इंसानियत हासिल
करने की !
अब तो सुधर जाओ, 
जाओ, मुआफ़ किया हमने 
 इस बार भी !
 पर अब नहीं,
बदलो दिमाग़ अब अपने 
नेस्तनाबूद हो जाओगे वरना .
 फ़लक के सितारे तो,
 न बन पाओगे.
मुमकिन है, राख हो जाओ !
और, अपने किये की सज़ा पाओ !

Monday, September 5, 2011

शिक्षक दिवस पर !

आज फिर पूजा गया मैं !
पांचवे सितम्बर को 
याद आ ही गयी मेरी ,
उन्हें , जो मेरी  सेवाओं के
प्रतिफल थे !
जिन्हें बनाने से पहले 
बनना चाहा था मैं.
सच का वो बीज,
जिसे अंकुरित होने में 
पूरे छब्बीस वर्ष  लगे थे!
जिसके पीछे एक ,
सुरक्षित आस थी !
और शुरुआत भी, जिसकी 
तफसील से  गुमराह थी !
कोई 'राधा कृष्णन' नहीं थे,
 जिसके पीछे !
पर, इस पूजा ने,
 इस सम्मान ने,
एक राह तो बनाई है ,
एक उम्मीद तो जगाई है.
एक संकल्प तो दिया है.
तुम्हारे लिए ही जलूँगा .
और कुम्हार भी बनूँगा 
तुम्हारी आशाएं गढ़ूंगा .
संकल्प आज लेता हूँ !
मेरे प्यारों .
भविष्य रोशन होगा तुम्हारा !
भविष्य रोशन होगा तुम्हारा !




Sunday, August 28, 2011

अन्ना के लिए !

 
रंग लाई है आज मेहनत तुम्हारी , 
चढ़ी  फिर से नई  जवानी है
भूल पायेगा नहीं इसको हिन्दोस्तां ,
आज ऐसी लिखी  कहानी है.
 दर्द कभी झलका नहीं ,चेहरे से. 
नूर हुआ न कम तुम्हारा 
आज पाया है जिसे , 
केवल बस केवल है तुम्हारा
 आंकड़े लोग बनाते रहेंगे , 
कहेंगे हम भी शामिल थे 
पर जो कुछ भी मिला है आज हमे , 
इसके सूत्रधार तुम मुकामिल थे.
गायेंगे राग तुम्हारा, नज़्म तुम्हारा सुनायेंगे .
भ्रष्टाचारी काँप उठते थे, भावी पीढ़ी को बताएँगे .
अन्ना , तुम्हे गाँधी या नेहरु क्यों पुकारे हम !
 तुम अन्ना ही ठीक लगते हो.
आज, जिसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत है
तुम, ऐसी एक लीक लगते हो.
छोड़ कर हमे जाना नहीं
ज्योति कभी बुझाना नहीं
यही  दुआ है, मशाल जलती रहे .
खुशियाँ जीवन की पलती रहें .
उनकी, जिन्हें न सहारा है !
बस जपते नाम तुम्हारा हैं .


Monday, August 15, 2011

  आज का ये पोस्ट मैं समर्पित कर रहा हूँ अपने एक शिष्य को, जिसके साथ एक हादसा हो गया और जिसके लिए मेरे पास ये शब्द रूपी संवेदना है, शायद वह इसे पढ़ ले !


कोई सुन न सुने मुकद्दर उसका 
फ़र्ज़ हमारा है आवाज़ लगाते रहना 
जिंदगी ठोकरें दे चाहे जितनी 
जोत से जोत  जगाये रखना !
आस टूटती नही ,चाहे बाधाएं जितनी आयें 
आस की सांस सजाये रखना
लोग तो कुछ भी कहते रहते हैं 
तुम हौसलों के पंख लगाये रखना !

Sunday, August 14, 2011

सभी ब्लॉगर बंधुओं एवं बांध्वियों को ६५ वें स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ . हमारा देश यूँ ही उन्नतियों के आसमान छुए,और तरक्की की ओर अग्रसर हो .

Saturday, August 6, 2011

वे पत्र !

आज डाकिये को देखकर 
अनायास ही याद आ गयीं तुम !
कॉलेज के वो दिन 
जब प्रेम के बीज अंकुरित हुए थे ! 
तुम्हारा पहला पत्र
जो एक छोटे से कागज़ के टुकड़े में था ,
लिपटा हुआ स्नेह सिक्त भावों से   
प्रेम का विशाल वट-वृक्ष बना जो !
तुम्हारे उन पत्रों की आस में घंटों 
दीवानों की तरह  करता  था
डाकिये का इंतजार 
और
उसे देखते ही मन-मयूर नाच उठता था  
और
जब कभी  डाकिया अनदेखा कर आगे निकल जाता 
तब 
हजारों आशंकाएं , हजरों सवाल  मन की तरंगों को मथने लगते 
क्या हुआ होगा !

तुम्हारे पत्र बार-बार पढता था मैं 
और हर बार ,  एक नई उमंग ....
एक नया ही अर्थ ,
निकलता था उन शब्द समूहों से !
वे पत्र देह बन जाते और 
बिखेरते थे खुशबू   
तुम्हारे अंदाज़ का पर्याय होते थे 
वे पत्र !

आज भी ,किताबों के पन्नो से 
जब-तब झांक लेते हैं 
और मैं खुद को रोक नही पाता
उन्हें पढने से !
जबकि हज़ार तल्खियाँ हैं 
जिंदगी की .
तुम्हारे  वे पत्र 
आज भी 
खुशबू बिखेर जाते हैं !

Tuesday, August 2, 2011

हरजाई !

सावन के झूलों में 
पींगे पिया के याद की समाई हैं 
तुम आओ ना,रिमझिम की झड़ी 
तुम्हारे प्यारे  स्पर्श का संदेशा तो ले आईं हैं !

नयन राह तकते हैं ,
झोंके बयार के मादक लगते हैं 
ऐसे में जब गूंजती है प्यार की शहनाई 
पिया ,नस-नस में एक हुलास सी ले आई है 

सखियाँ जब करती हैं रात की बातें 
गुजारी बाँहों में सौगात की बातें 
तुम्हारे स्नेहिल-स्पर्श की  यादें
मेरे दिल की धडकने देती हैं दुहाई 
लेती हैं नाम तुम्हारा ,  कहती हरजाई हैं 

तुम आओ ना ,रिमझिम की झड़ी 
तुम्हारे प्यारे स्पर्श का संदेशा तो ले आयीं हैं !


Monday, August 1, 2011

किस्मत !


 शायद पता  नहीं  तुम्हे 
कई बार अश्क जो सूख जाते हैं, 
गालों पर लकीर जैसे  
एक पूरी कहानी का सामां होते हैं ,
छुपी होती है उन लकीरों में ,
पेट की बे-बसी .
छत से टपकते बूंदों की त्रासदी !
हरियाली नहीं भाती , उन्हें 
तुम्हारी तरह, नही निहारते , वे
खूबसूरत तस्वीरें. लहराती वादियाँ,
उन्हें तो धरती भी गोल है, इसका नहीं पता .
रोटी की सोंधी खुशबू का एहसास नहीं होता ,उन्हें .
उन्हें तो बस ,पता है भूख.
जिसे  उन सूख चुकी लकीरों से कभी-कभी
बुझा लिया करते हैं. 
बड़े गेट के अंदर की रंगीनीयों  ,
का भान नहीं होता उन्हें .
वे  तो बस , ताक में रहते हैं ,
कब  कुत्ते के हाथ लगी रोटी,
उनके कब्ज़े में आ जाय . 
और एक  पार्टी , आज उनके  भी 
नसीब का हमसफर हो !

Thursday, July 28, 2011

कोई बताये हमें !


कल  तक  जो  हमसाया था मेरा 
आज पास आने से भी कतराता है
क्यूँ होता है ऐसा , कोई बताये हमें !
क्यूँ ये प्यार समय में सिमट जाता है !  

क्यूँ हसरतें रह जातीं हैं अधूरी
क्यों दिल ये तनहा हो जाता है !
तमन्नाएँ , आरज़ूओं  की ख़लिश बढ़ातीं हैं 
क्यूँ कोई गूंथ के बिखर जाता है !

यारब तूने गढ़ें हैं खेल ये कैसे ?
रचा ये कैसा तमाशा है 
जब प्यार मंजिल  का एहसास पाने लगता है 
दिल ये  टूट  के बिखर जाता है !

Wednesday, July 27, 2011

बे -वज़ह


चलो, कुछ तुम कहो,कुछ हम  कहें
गुजर जायेंगे ये लम्हात यूँ ही 
आशियाँ मुहब्बत के रोशन होते रहेंगे 
जब दीदारे -यार चश्मनशीं  होगा !
ख्वाहिशें पूरी हों कि न हों 
दामन तुम्हारा कभी न छोड़ेंगे 
रहगुजर साथ रहेंगे हम तुम्हारे 
ख्वाहिशों कि बरसात न छोड़ेंगे 
बुनते रहेंगें सामां,अपनी बरबादियों का !
जश्ने-बहारां के हसरात न छोड़ेंगे !

Tuesday, June 28, 2011

अनायास ही !

टकटकी लगाये हुए देखता हूँ तुम्हे 
महसूसता हूँ कंपन तुम्हारे लबों का !
तुम्हारे काजल की धार 
तुम्हारे फड़कते अभ्र 
कितना  खुशनसीब हूँ मैं ,
जो तुम्हे पाया है ----------
"उम्र ढ़लती जाती है 
बुढ़ापा देने लगा है दस्तक 
चांदी की चमक -
झाँकने  लगी है बालों में "
तुम कहती हो .

मुझे लगता है -
और भी खूबसूरत हो गयी हो तुम !

तुम्हारे नक्श आज भी ,
इक अंगड़ाई का कारण है .
स्मित तुम्हारा -
एक मादक संगीत का दस्तक !
तहाते हुए मेरे कपडे 
सजाते हुए मेरी थाली 
और-
कभी हिचकी लेते ही दौड़ना -
पानी के ग्लास के लिए !
तुम कितनी अच्छी हो !

छोड़ आई अपनी देहरी 
जहाँ गुड़ियों के लिए कभी -
सहेजती थीं कपड़े !
लगाती थीं 
बालों में महकता फ़ूल!
आज देखता हूँ तुम्हे-
सहेजते हुए घर की तक !
सजाते हुए 
दरवाज़े पर एक रंगोली !
तुम कितनी खुबसूरत हो !

मेरे ये शब्द ,
क्या कभी -
देंगे तसल्ली 
तुम्हे !
क्या समझ पोगी तुम 
कितनी कसक उठती है 
तुम्हारा साथ, तुम्हारा स्पर्श पाने को !
आज शब्दों के ताने-बाने
बुनकर "अनायास ही "!
तुम कितनी खुबसूरत हो !

Monday, May 2, 2011

चलो चाँद छू आयें !

दिल ने कहा-चलो चाँद छू आयें 
चाहे ,जितनी भी अड़चने आयें 
शीतल-मृदुल चाँद का स्पर्श 
पाकर क्यों न हम खिल जायें 
दूरी का भी क्या ग़म करना 
जब मंजिल पर ताक लगायें 
चलते जायें , बिना हिचक के 
मंजिल को हासिल कर पाएं 
छोटी-छोटी आशाएं हैं .
छोटे-छोटे ही हैं सपने 
इन सपनो को पालेंगे गर 
तभी स्वप्न साकार हो पाएं  

दिल ने कहा-चलो चाँद छू आयें 
 चाहे ,जितनी भी अड़चने आयें !

Sunday, May 1, 2011

औ भगवन हम तक भी आएगा !

आज दिवस है उन लोगों का !
जिन्हें न उनका भान है .
सारा दिन तपती धरती पर
मिला कहाँ विश्राम है !
तुम कहते हो बदलो किस्मत !
तुम्ही ठोकरें देते हो .
जब भी माँगा है हक अपना .
विष-वमन ,तुम्ही कर देते हो. 
तुमसे  अच्छा  तो विषधर है ,
मेरा सहभागी रहता है 
जब तक न उसे छेड़ा जाये 
साथी ही साथी रहता है !
सारे सपने साकार किये 
तुम पर हमने उपकार किये 
पर कैसे इन्सां हो तुम महलों के 
हम पर बस तुम प्रहार किये !
कब तक कुचलोगे , रौंदोगे
कब तक हम सबको सौदोगे 
एक दिन ऐसा भी आएगा 
जमीर हमारा जाग जायेगा 
और जिन्हें पूजते हो महलों में 
वो भी हमसे घबराएगा .
अब तक वो रहा तुम्हारे दर
तुम्हे छोड़ के जायेगा !
इम्तहान होगा फिर ख़त्म 
औ भगवन हम तक भी आएगा !
 

Thursday, April 28, 2011

कोयल बोलती है !

मेरे दरवाजे कोयल बोलती है !

सुबह का  सूरज भी 
जब अलसाया रहता है 
माँ के आँचल से मुंह  ढांपे 
धीरे-धीरे आँखें खोलता है 
अख़बार की मुट्ठी बाँधे जब ,
अमराइयों में बयार डोलती है.
मेरे दरवाजे कोयल बोलती है !

कुहू-कुहू की लयात्मक ध्वनि ,
मुझे मदहोश बना  देती है
ख़ामोशी जब खामोश बना देती है 

दुलकी चालों से चलती है 
पापा की आँखों में 
पूत के भविष्य की चमक 
सुबह ,जब सूर्य की तपिश का 
भार तोलती है 
मेरे दरवाजे कोयल बोलती है !

दूर किसी आंगन के मंदिर से 
घंटियों की मधुर रुनझुन 
पानी की टोंटी से बहती धार पर 
किसी रामनामे की धुन 
कहीं अलसाये चूल्हे से
निकाली जाती राख की सोंधी 
खुशबू  !
मन-मंदिर के नए द्वार खोलती है 
मेरे दरवाजे कोयल बोलती है !
 

Thursday, April 21, 2011

आदमजात !


अकेलेपन की त्रासदी ,
उस बुढ़िया की आँखों से 
झाँक रही थी !
मेरे घर आयी थी वो -
काम मांगने !
बेटा , झाड़ू,पोछा कर दूँगी 
बर्तन भी धो दूंगी 
मेरा कोई नहीं है !
कृशकाय, कमजोर देह को ढांपे 
एक झिलंगी साड़ी में उसे देखकर 
पूछा मैंने -
घर में कौन - कौन है !
दो बेटियां , एक बेटा ,बहू
और दो नाती -पोते
'फिर भी काम ढूँढ रही हो '!   
पूछा मैंने .
आँख भर आई  उसकी 
रोते हुए कहा -
बहू खाने को नही देती 
मारती है !
'बेटा कुछ नही कहता !'
फिर पूछा मैंने !
"चुप" कुछ नही कहा उसने .
सोचता रह गया मैं 
क्या हम आदमजात हैं !
 

Tuesday, April 19, 2011

मुक्ति !


स्त्री मुक्ति पर की जाती हैं बहसें 
बातें, संगोष्ठियाँ और न जाने क्या -क्या !
अक्सर औरतों को सुना होगा आपने ,
और 
कहते हैं विद्वजन 
महिला मुक्ति हेतु -
निवृत करो रसोई घर से उन्हें -
नजर आते नही -
बिगड़ते मासूम ,
बिखरे ड्राइंग रूम  !
फास्ट और फ्रोजन फ़ूड हैं अब -
संस्कृति का हिस्सा 
'पॉप' तुम आउट डेटेड हो 
है अब रोज़ का किस्सा  !

इक्कीसवीं सदी के राजकुमार-राजकुमारियां 
अब होंको-पोंको -पो करने लगे हैं 
'एस के पी' ही 
अनुभव  से सराबोर होने लगे हैं !
बस वर्तमान ही बचा है अब ,
आँखें मिचमिचाने को 
चकाचौंध करती रोशनियों में 
दूर का देखा , पास का अनदेखा 
और रात को दिन , दिन को रात
में बदल जाने को !
भविष्य व भूत की बातें क्यों करते हो 
बस आज को जियो 
प्रेम के रस पियो !

Thursday, April 7, 2011

आज मैं आपको  एक   नयी इबारत का दीदार कराने जा रहा हूँ ! इसका लुत्फ़ लीजिये !

پڑھتا رہتاہو 
 خاتون  کوتیرے  تنھی مے کوئی اتا ہوا دیکھا تو چھپا لیتا ہو 
فلک سے کہکشا کا سلام آیا ہے
 اور یقین ہو نہ ہو تم کو میرے لب پر
 کے خدا کے بعد تمہ تمہارا ہی نام آیا ہے

Monday, April 4, 2011

         इंतज़ार  

 देहरी   पर देर से खड़ा , 
करता रहा था तुम्हारा इंतजार!
तुम नही आये, ना ही आया
 कोई संदेसा तुम्हारा! . 
क्यों इम्तिहानों के दौर से
 गुज़ारा करते हो मुझे . 
सब्र, कहीं तल्खी में न बदल जाये.

चाहा था कई बार, भूल जाएँ तुम्हे. 
गालिबन इश्क की इन्तेहाँ नही होती !.
बदस्तूर ,सीने में चुभन रहती है बरक़रार. 
पर तुम्हे क्या , तुम तो बे खबर हो ,
इश्क का आग़ाज़
 कराया था तुमने ही ,
अब अंजाम से पहले 
साथ क्यूँ  छोड़ रहे हो ! 
मेरी तड़प का गर न हो अंदाज़ा तुम्हे .
पूछ लो , उन हवाओं से , 
तुम्हारी बंद खिड़की से
 टकराकर लौट आती है जो बार - बार ,
अक्स तुम्हारा देखने को बेकरार !
ऐसा  ना हो कि, देहरी पर ही दिया बुझ जाये , 
और.............
तुम्हारी नज़रें बेसाख्ता , दर-ब-दर भटका करे ! 

Sunday, April 3, 2011

भारत की विश्व कप जीत पर !


जीत का जश्न मनाओ आज तुम !
झूमो, नाचो, गाओ आज तुम.

विश्व के फलक पर चमकते  सितारे की तरह
रोशन हो जाओ ,फहराओ पताके,
लहराओ आज तुम !

मेहनत तुम्हारी रंग ले के आयी है
हमने भी तुम्हारे लिए ,
आज महफिल सजाई है

सरताज हो तुम हमारे,
 आज दिया है वो अमोल तोहफा !
बस तुम ही तुम हो यहाँ आज दिल में
और अब , 
सारे जहाँ पर छा  जाओ तुम !

चलो, पूरा हुआ आज एक सपना
चूमो कप को, मिलो गले , रोको मत,
बहकने दो कदमों को .
इस सपने की हकीकत पर
ठुमके लगाओ आज तुम !

हम भी पुलकित हैं , भर आयें हैं,
 नैन आज .
इंतजार की घड़ियाँ बीत गयीं हैं अब
इस हकीकत की ज़मीं पर
लड़ियाँ दीयों के जलाओ आज तुम !

Sunday, March 27, 2011

                                                      तुम्हारे लिए !
विरोध के स्वर  विरल हो जाते हैं, जब  समाज सबलों की अनैतिकता का समर्थन करने लगता है ,और यह  अधिकतर तब होता है जब लाभ कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों की चेरी होती है , ऐसे में सच्चा , सज्जन , इमानदार  और सटीक  व्यक्ति भी पथभ्रष्टता को प्रश्रय  देने के बारे में सोचने लगता है  पर सच्चरित्र जीवन की सच्चाई  तो यह नही हो सकती ! ऐसे में अत्यधिक आवश्यकता होती है , आत्मबल की ,और विरोध के विपरीत ख़म ठोककर  खड़े होना ही बहादुरी का पर्याय है . जिस प्रकार दीये की लौ  तेज़ आंधी में विचलित तो होती है , पर बुझती नहीं और अधिक जोर लगाकर उसका सामना करती है !

आज यह विचार अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि सामाजिक उत्थान व स्वयं की जीवन्तता  को सिद्ध करने हेतु यह आवश्यक है .वर्तमान परिस्तिथियों  में  सामाजिक विद्रूपता व नीति ह्रास पर अंकुश हेतु यह आवश्यक है की नौजवान पीढ़ी विरोध करे , सार्थक विरोध करे ! और जो परिस्तिथियाँ ,सामाजिक उत्थान का अवरोध बनती हैं, उसे तोड़कर नए समाज का निर्माण करे !

कौन कहता है , आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तवियत से उछालो यारों !

बहुत ज़रूरी है  , हम जो काम हाथ मे लेते हैं, उसकी परिणति तक पहुंचें , यह नही कि  बस शुरू किया और विरोध होते ही ढीले पड़ गए !
मेरी पूर्व में लिखी एक कविता यहाँ प्रासंगिक है ,और इसलिए मैं इसका पुनर्लेखन यहाँ पर करता हूँ ............
विपदाएं तो आएँगी _सखा मेरे
जब भी लोगे तुम एक दृढ़ संकल्प
ठोकरें तो लगेंगी ही राह मे
बनना चाहोगे __जब एक विकल्प
नियति ने क्या ___कभी मारी है ठोकर !
उस संत को ,भरा हो जिसमे __केवल
___आत्मबल ____
ये , आत्मबल ही तुम्हे पहुँचायेगा
शिखर तक !
तुम अगर आज करो ____ एक संकल्प
विकल्प _तुम तो हो सकते हो
होगा न कोई , तुम्हारा विकल्प ....


अब यह पत्र/चिटठा लिखने कि आवश्यकता इसलिए पड़ी है,कि मेरी एक चर्चा में नौजवान मित्रों द्वारा कुछ अवसाद कि झलकियाँ देखने को मिलीं, और उनके लिए .............

तुम चीर दो सीना चट्टानें आज़म का  
रास्ता खुद-ब-खुद दीदारे-यार आएगा !

Wednesday, March 23, 2011

            वो दिन ......!


वो दिन कितने सुखकर थे
जब तुम्हारी ऊँगली थामे .
घंटो भर गलियों के घेरों में
तुम्हारे तोतले स्वर-रस
की मिठास कानो में घुलते.
समय पंख लगाकर उड़ जाता था .

आज का एक दिन है ,जब
तुम्हारे सानिध्य की आस
लगते हैं हम ,
तुम तेजी से निकल जाते हो
सैकड़ों ज़िम्मेदारियों से
आबद्ध, तुम हमे भूल जाते हो !

वो दिन कितने सुखकर थे
तुम्हारी चपलता ,
हमारा रोम-रोम पुलकित करता.
तुम्हे जो ठेस लगती-
दिल हमारा रोता .
तुम्हारी बलैयाँ लेते .

आज का एक दिन है ,जब
दर्द से कराहते हम ,
एक छोटी सी शिकायत करते हैं .
तुम्हे, कहते सुनते हैं
'छोड़ो न यार ,
इनका तो रोज का नाटक है
हम अपनी शाम क्यूँ खराब करें !

Monday, March 21, 2011

कल  की  अनुभूति  का एक चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश करता हूँ . आप चाहें तो  इसे सराह भी सकते हैं...............आपकी टिप्पणियां आमंत्रित हैं !




तिरछी चितवन, भींगा तन-मन 
महका -महका सा है मधुवन 
छलके है मृदु-प्रेम तुम्हारा 
आह्लादित होता है जीवन !

आज सरस है नेह तुम्हारा 
कलकल बहती जीवन -धारा
जी करता है , डूबूँ इनमे 
कर दूं अपना जीवन -अर्पण !

तुम जो आये ,सावन आया 
प्रेम-सुधा का रस बरसाया 
छुन-छुन, छन -छन बजे पायल 
गुंजित हुआ आज घर -आंगन !

तिरछी चितवन, भींगा तन-मन
महका -महका सा है मधुवन !

Wednesday, March 16, 2011

होली है भाई होली है 
बुरा न मानो होली है 

कुछ भी डालो ,चाहे कीचड़
रंगों की रंगोली है 

राधा हो या मीरा हो
कंकड़ हो या हीरा हो 
करो टिप्पणियों की बरसात 
 ठोस ही है या पोली है.

कुछ तो मीठी लगे गुझिये सी
कुछ कडवी, रंगों मिश्रित सी 
जैसी भी हो , हँसते जाओ
होली की ठिठोली है .

मौका है बस मौज मनाओ 

ग़मगीन हो तुम रास रचाओ 
फुहार रंगों की बरसाओ
कहदो आज बिचौली है 

रस-बयार फागुन का है 
मौका बस पाहून का है,
पहुँचो बस, जहाँ जी चाहे 
दिलवालों की दिलजोली है 

ढोल नगाड़े खूब बजाओ 
नाचो ,गाओ दिल बहलाओ 
बरसाने  की  गारी गाओ
हिल-मिल जाओ ,द्वेष भुलाओ 
अब तो सब हमजोली है 


होली है भाई होली है...................

सभी बंधुओं/बांध्वियों  को होली की हार्दिक शुभकामनायें, गुझिये व रंगों की होली का आमंत्रण है . आप सभी सादर पधारें.

Monday, March 14, 2011

    जापान के लिए 

नम हैं आँखें, अंतर गीला 
देखी प्रकृति की विनाशकारी लीला 

मानव जाति के प्रेरणाश्रोत तुम
छोटे कद के देवदूत तुम !

साहस अनुकरणीय तुम्हारा 
पावन हृदय, जाने जग सारा 

विश्व पताका फहराओगे 
हतभागी हो, उबर जाओगे !

तुमने  झेले, हिरोशिमा-नागासाकी 
अनुकरणीय साहस की झांकी 

नया फुकुसिमा तुम बसाओगे 
विश्वास है , उबर जाओगे 

दुःख है हमें, हमारे भाई 
ईश्वर है , वो नहीं कसाई !

प्रण करते हैं , होंगे सहभागी 
तुम्हारे लिए ,
भगवन  से  हम भी  हैं रागी !

Sunday, March 13, 2011

                                                लिखने का उद्देश्य !

ब्लॉग्गिंग की दुनिया में मेरा पदार्पण सं 2008 में हुआ था. तब शायद ब्लोग्स  इतने पॉपुलर नहीं थे . मन में उठते विचारों की अभिव्यक्ति का एक सुगम,सटीक,उपयुक्त व मुफ़ीद ज़रिया लगा था मुझे . कविता तो मैं पहले से करता आ रहा था ,पर तब केवल मेरे कुछ मित्र ही इन्हें सुनते थे, या मुझे जानते थे , पर ब्लॉग्गिंग के माध्यम से अब कई लोगों की टिप्पणियां प्राप्त होती हैं.अच्छा लगता है, जब कोई सराहता है या हौसला -अफजाई होती है. लोग कह्ते भी हैं कि लेखन टिप्पणियों के लिए नहीं होना चाहिए, ठीक भी है, उद्गार तो उद्गार हैं  और इन्हें दर्शाने का कोई आसान माध्यम है . ( यहाँ प्रकाशन के लिए गुटबाजी, पहुँच या मठाधीशी की आवश्यकता नहीं है.),तो फिर टिप्पणियों की चिंता क्यों !  परन्तु यह भी सच है क़ि टिप्पणियों के बाद उत्साह द्विगुणित हो जाता है , और शायद यह  फ़र्ज़  बन जाता है कि टिप्पणीकार को कुछ और भी बताया जाय.
साहित्य की सशक्ति मेरे विचार में यह नही है कि आप कितना उम्दा लिखते हैं , बल्कि इसमें है कि आप कितना उपयोगी लिखते हैं. शब्दों के माध्यम से ही सही , यदि सामाजिक उत्थान हों, संवेदनाओं  को बल मिले , समाज की उपयोगिता व इसके समुचित निर्माण का भान हो सके तो शब्द प्रभावी हैं.
कई बार लोग यह भी कहते हैं - " रूप, जब आप रसायन के शिक्षक  हैं , तब साहित्य के प्रति इतनी अभिरुचि क्यूँ !"  और मैं उन्हें उत्तर देता हूँ.  "रसायन विज्ञान तो प्रयोगशाला तक सीमित है  , परन्तु साहित्य असीमित है, विस्तृत है. रसायन के माध्यम से मैं अपने शिष्यों से रु-ब-रु होता हूँ , जबकि साहित्य के माध्यम से मैं अपने गुरुओं से ! "  और तब मेरे मित्र अनुत्तरित हो जाते हैं .
कई बार कविताओं की श्रेणी पर बात होती है.  कभी रोमांटिक कविताएँ , तो कभी विशुद्ध दार्शनिक .... दरअसल दार्शनिक होना ही सामाजिक होना है , ऐसा मै सोचता हूँ. सच कहूँ तो दर्शन ही जीवन है . शिशु के पहले कदम से उसके अवसान तक जीवन, दर्शन ही तो है . और कविताओं के माध्यम से इसका प्रदर्शन आसान हो जाता है .
आज आभारी हूँ मैं उन अपरिचित मित्रों का ( व्यक्तिगत रूप से ) जिन्होंने मेरे उद्गारों पर टिप्पणियां की हैं या कर रहे हैं.
लिखने के कई कारण होते हैं.पर उनके प्रकाशन का मात्र एक कारण होता है . अधिक से अधिक लोगों तक  उसे पहुँचाना !

 ये चित्र जो उकेरे हैं मैंने कागजों पे 
तुम्हारे ही तो अक्स हैं यार मिरे ! 

विचारों की श्रृंखलाओं को  क्रमबद्ध करने की खूबी नही है शायद मुझमे . जब जो जी में आता है , लिख देता हूँ . कितना उपयोगी है, कितना नही , यह मै नही जानता. कितनो तक पहुंचेंगे मेरे  विचार, कौन कुछेक शब्दों के बाद ही "अगला ब्लॉग " क्लिक करेगा, पर खुद को संतुष्ट करने हेतु यह भी आवश्यक है, कि शब्दों को सहेजकर किसी  एक प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करें. 
ब्लोग्गर्स  की दुनिया में विविधताएँ भी हैं . कुछ खालिस कविताएँ करते हैं , कुछेक यादों के संस्मरण प्रस्तुत करते हैं और कुछ सामाजिक सरोकार व उत्थान की बातें करते हैं . कुछ ऐसे भी हैं जो रोजमर्रा की वस्तुओं पर केन्द्रित होकर कविताएँ करते हैं .
उपयोगिता सभी की है और स्थान भी सभी के निर्धारित हैं. 
फिर ,  जब कभी मै अनचाही टिप्पणियां पढता हूँ तो लगता है , यहाँ भी मठाधीशी, गुटबाजी व लोब्बींग शुरू है , जो औचित्य विहीन  है .  क्या शब्दों के माध्यम से आप सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं.  कभी नहीं. आप तो बस  अपना काम कीजिये .
और वैसे भी , वो कहते हैं न ..
जाकी रही भावना जैसी......

लगता है , लेख कुछ लम्बा हो चला है , तो फिलवक्त .....क्रमश: 

इक आस है पहुंचोगे  तुम भी मकां तक 
बस रहगुजर चलते चलो..बस रहगुजर चलते चलो .......!
 

Friday, March 11, 2011

                                  यूँ ही ,बिखरा सा  !

भरी दोपहरी , शब्दों  के  आड़े -तिरछे जंजाल बनाते हुए मैं थक गया तो कलम  उठाकर  ताक पर  रख  दिया . डायरी के पन्ने मेरी ओर बेदिली से ताक रहे थे और मैं नासमझी की मुद्रा में उन्हें ही घूर रहा था . सोचता रह गया -क्या करूँ ! राह पर चलते हुए लंगड़ी घोड़ी की सायकिल , पीछे दौड़ता छोटा सा बच्चा और मकान की खिड़की से झांकती बेजार सी एक अधेड़ स्त्री ! विक्षिप्तता की हद तक परेशां होते हुए, किशोर कुमार की तरंगे कानो में गूंजने लगीं..............
ये क्या हुआ....कैसे हुआ......कब हुआ .....क्यों हुआ ......................
और तब .....


नहीं समझ सकते तुम हमारे मन की व्यथा 
आकुलता की परिणति नहीं होती शायद !

यदि वेदना हमारे शब्दों
की भाषा का आदेश मानती,
यदि हवा का वेग हमारे ,
मनोभाव संचालित कर पाता तो शायद !
दिल से आती है एक तल्ख़ सी सदा
लगता है ,पिछले कई जन्मो की
गूंज है शायद !
तुम्हारा साथ,
जीवन का हर पल ,
खुशियों की सौगात लाती
तो शायद !
पेड़ों से झरते पत्ते ,
नि:शब्द काली सडक पर
न बिखरते .
अपने झकझोरे जाने पर ,
करते वे प्रतिरोध ,
निर्विरोध नही गिर पड़ते
तो शायद !
कुछ पंक्तियाँ हैं, जो बिखरी पड़ी  हैं , इधर -उधर
इन्हें सहेजा होता , तो शायद !
पुरानी उजाड़ सी इक हवेली है ,
रौशनी का इक  दीया जलाया होता
तो शायद !

Tuesday, March 8, 2011

                                                            उम्मीदें !
  आज एक कविता पढ़ी , सामयिक है , क्योंकि जिस तरह कि अपेक्षाएं हम अपने बच्चों से करते हैं , और जिस तरह का बोझ उनके मन -मष्तिष्क पर डाले हुए हैं ,उससे लगता है कि कहीं-न-कहीं इस कविता का औचित्य है, एक बार फिर साफ़ कर दूँ कि यह कविता मेरी नहीं है .पर मुझे लगा कि बहुत सरे ऐसे भी होंगे जिन्होंने यह कविता देखी या पढ़ी नहीं होगी ...इसलिए....

पापा कहते बनो डॉक्टर ,
मम्मी कहती इंजिनियर .
भैया कहते इससे अच्छा -
सीखो तुम कंप्यूटर.

चाचा कहते बनो प्रोफेसर 
चाची कहती अफसर   
दीदी कहती आगे जाकर ,
बनना तुम्हे कलेक्टर .

दादा  कहते फौज में जाकर , 
जग में नाम कमाओ!
दादी कहती घर में रहकर
ही उद्योग लगाओ !

सबकी अलग-अलग अभिलाषा 
सबका उनसे नाता 
लेकिन मेरे मन में क्या है 
कोई समझ ना पाता  !


क्या आपको नहीं लगता कि उम्मीदों  की फेहरिस्त कुछ  ज्यादा ही लम्बी हो गई है .अगर हाँ तो फटाफट बताएं  , क्या सही होगा और क्या ग़लत और क्यूँ भाई !

 

Monday, March 7, 2011

आया फागुन, आया फागुन
तन -मन को हर्षाया फागुन
मधुर-मधुर  बरसे बयार
जीवन को सरसाया फागुन


खिल उठी हैं कलियाँ प्यारी
चढ़ती  जाती है बस खुमारी
मौसम का खुमार  है तारी
हर -दिल को धडकाया फागुन 

 आया फागुन, आया फागुन.


बासंती बयार अति भाये
मधुर-मदिर सा सब  पर छाये 
उमंग-तरंग ,जन-जन मुस्काए 
गुन-गुन-गुन गुंजाया  फागुन 


आया फागुन .........

Sunday, March 6, 2011

          और कुछ देर ठहर
और कुछ देर ठहर, और कुछ देर न जा 
ज़िन्दगी की शाम यूँ उदास  न कर.
उम्मीदों की शमा अभी तो जलाई है 
अभी तो बस तेरी याद आयी है. 
यादों की मदहोशी को बर्बाद न कर
जिंदगी की शाम को यूँ उदास न कर.


और कुछ देर ठहर, और कुछ देर न जा 
तेरे सानिध्य से दिल मेरा महक जाता है 
बर्बादे-इश्क भी कुछ आस सा दिलाता है 
हमारी आस को तू और भी बे -आस न कर .
और कुछ देर ठहर..............................

तेरे काँधे पे सर रखकर, सुकूँ पा तो लूँ मैं
उदास रात को ,कुछ और तो   महका लूँ मैं.
इस रूत को हसीं और तो बना लूँ मैं 
तेरे गेसुओं के फैलाव का विस्तार तो कर 
और कुछ देर ठहर....... और कुछ देर न जा ...!

Monday, February 28, 2011

 कुछ लिखा तो था   !

कुछ लिखा तो था   !
पता नहीं क्या .

दीवार पर लिखी इबारत की तरह
या कि शायद  फटे अख़बार के
उड़ते पन्ने पर !
कुछ तो था , जो अनकहा 
रह गया था
पढ़ नहीं पाया था मैं .
बस लिखकर रह गया था .

क्या था वो.!
एक दबी ख्वाहिश
एक दमित इच्छा
कल देखा था उसे
हवा में दूर तक उड़ते हुए,
कोई अवरोध नहीं था .


दूर तक निर्विघ्न ,
पुरवइओं में कुलांचे भरते हुए

क्षितिज  के पार , असीमित उड़ान
और तब , लगा था ये
शायद इबारत की
तरह दीवार पर चिपका होता
तो बेमानी होता !
               कुछ नया पाने की आस में 
चलो छूट रहा अब साथ पुराना
नया दिन, नयी रात , नए लोग,जग हो सुहाना

कुछ रीझेंगे, कुछ रिझाएंगे
कुछ सीखेंगे, कुछ सिखायेंगे
नए नभ के नव क्षितिज पर
आशाओं के नव दीप जलाएंगे .

सुखकर थे वो बीते पल-छिन
मधुमय होंगे आने वाले दिन
भूलेंगे कटु याद, कडवे घूँट
नव अमृत-कलश बरसाएंगे

कुछ विरह के दिन बिताएंगे
कुछ यादें नयी बनायेंगे ............!
हाय ! ये खामोशियाँ , नाकामियां , रूसवाइयां 
इश्क आखिर इश्क है , तुम क्या करो, हम क्या करें .
 (उपरोक्त पंक्तियाँ मेरे प्रिय ब्लॉगर बंधु को समर्पित हैं . कृपया इन्हें अन्यथा न लिया जाय !)
चेहरे पर उभर आयीं  ये लकीरें तनाव की,
ये यूँ ही नहीं उभर आई हैं.
छेड़ा है इन्हें उन नामुराद हवाओं ने ,
जिनकी शोखी में भी रुसवाई है  !

Tuesday, February 22, 2011


परिवर्तन -स्विमिंग पूल में !


वो कहते हैं -
हम परिवर्तन लायेंगे !
समाज को देंगे नयी दिशा !

कराहती मानवता को
खुशिओं का सागर देंगे .
"हम छीन लेंगे गरीबों की गरीबी
सोने की चिड़िया और
धरती को स्वर्ग बनायेंगे ."

हम इसे हकीकत में
परिवर्तित होता देखने की खातिर ,
सपनो के संसार में
विलुप्त होते चले जातें हैं
और गरीबी उनकी दूर हो जाती है
सोने की चिड़िया
उनके ही चाँदी के पिंजरों में
क़ैद हो जाती है .
परिवर्तन होता है
और ---
खुशिओं का सागर उनके
स्विमिंग पूल में बहता है !

Monday, February 21, 2011

            तुम्हारे लिए !/अंतहीन 


क्यों होता है ऐसा !
अपनों की पहचान ही नहीं
 दे पाते अपने !

हम चाहते हैं- पूछे जायं
जांचे और परखे जायं
दुलराये व पुचकारे जायं !

सहलाये , हौले से कोई
बालों को हमारे .
स्पर्श मुलायमियत का
छू जाय हमारी पेशानी को
पर ...........
हो जाते हैं ....
ये हकीकत भी ,
कभी कभी स्याह सपने !
झिडकियां ,प्रेम की हों -
चीखें भी,
जब हमें पास बुलाएं
कभी भागम-भाग,
कभी, रूठें-मनाएं
कभी शोरो-गुल, तो कभी
हम साथ गीत गाएं
आते हैं ऐसे पल ही
कितने !
बेफिक्री का ये आलम ,
जब साथ छोड़ जायेगा
सोचेंगे तब,
क्या खोया ,
क्या पाया
शब्द , बेमानी हैं.

जिसे जाना है, जिसे भोगा है
जिसे परखा है, जिसे टोका है
यादों की एल्बम का,
एक हिस्सा है
और...
यही जीवन का सच भी !

Wednesday, February 16, 2011

                                                                 मैं 

 
                                                                मैं,
                                                   नदी का तीर नहीं,
                                                 जो तुम्हारी प्यास बुझाऊं 
                                                  ना ही ओस की बूँद हूँ , 
                                                  जो सीपी में गिरकर 
                                                   मोती का रूप पाऊं 
                                                           मैं,
                                                  वह नींद भी नहीं ,
                                               जो ख्वाबों के बाग़ सजाकर 
                                               तुम्हारी उन्मुक्तता के गीत गाऊं.
                                               ना ही बादल का वो टुकड़ा हूँ ,
                                               जो रिमझिम फुहार बरसाउं.
                                               मैं ,बासंती गुलाल भी नहीं  ,
                                                जो तुम्हारे चेहरे की
                                              रंगत में उजास लाऊं 
                                                   मैं तो वह अंगारा हूँ ,
                                                 जो तुम्हारे हृदय की
                                              तपिश को और बढ़ाऊंगा 
                                                तुम्हें ठोकर देकर ही 
                                              "मंदिर का देव"बनाऊंगा !