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Thursday, July 28, 2011

कोई बताये हमें !


कल  तक  जो  हमसाया था मेरा 
आज पास आने से भी कतराता है
क्यूँ होता है ऐसा , कोई बताये हमें !
क्यूँ ये प्यार समय में सिमट जाता है !  

क्यूँ हसरतें रह जातीं हैं अधूरी
क्यों दिल ये तनहा हो जाता है !
तमन्नाएँ , आरज़ूओं  की ख़लिश बढ़ातीं हैं 
क्यूँ कोई गूंथ के बिखर जाता है !

यारब तूने गढ़ें हैं खेल ये कैसे ?
रचा ये कैसा तमाशा है 
जब प्यार मंजिल  का एहसास पाने लगता है 
दिल ये  टूट  के बिखर जाता है !

4 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

क्यूँ कोई गूंथ के बिखर जाता है !

सुंदर ...बहुत सुंदर रचना

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरती से लिखे हैं मन के भाव

vidhya said...

वाह बहुत ही सुन्दर
रचा है आप ने
क्या कहने ||
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
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ZEAL said...

Love is like that only . It must be one way , without expectations to remain unhurt . Love is gust giving and giving and giving ....