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Monday, February 28, 2011

 कुछ लिखा तो था   !

कुछ लिखा तो था   !
पता नहीं क्या .

दीवार पर लिखी इबारत की तरह
या कि शायद  फटे अख़बार के
उड़ते पन्ने पर !
कुछ तो था , जो अनकहा 
रह गया था
पढ़ नहीं पाया था मैं .
बस लिखकर रह गया था .

क्या था वो.!
एक दबी ख्वाहिश
एक दमित इच्छा
कल देखा था उसे
हवा में दूर तक उड़ते हुए,
कोई अवरोध नहीं था .


दूर तक निर्विघ्न ,
पुरवइओं में कुलांचे भरते हुए

क्षितिज  के पार , असीमित उड़ान
और तब , लगा था ये
शायद इबारत की
तरह दीवार पर चिपका होता
तो बेमानी होता !

3 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन अनुभूति ...सुन्दर रचना

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

क्षितिज के पार , असीमित उड़ान
और तब , लगा था ये
शायद इबारत की
तरह दीवार पर चिपका होता
तो बेमानी होता !
गहन विचार...... बेहतरीन पंक्तियाँ

Sunil Kumar said...

क्षितिज के पार , असीमित उड़ान
और तब , लगा था ये
शायद इबारत की
तरह दीवार पर चिपका होता
तो बेमानी होता !
बेहतरीन पंक्तियाँ.....