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Friday, February 11, 2011

                दो दृश्य
माँ पूछती है 'कब आओगे'
बहुत याद आती है तुम्हारी !
बहू और बच्चे कैसे हैं .
तुम्हारी तबियत तो ठीक रहती है .
और हर बार ही मै ,
बहाने बना कर टाल जाता हूँ,
बहुत व्यस्त हूँ .
छुट्टी मिलते ही आउंगा 
तुम चिंता मत करना 
सभी अच्छे है. 
और फोन रख देता हूँ.

कल इतवार है,
बीवी की फरमाइश पूरी करनी है 
'मॉल ' मे नई साड़ियों का स्टाक आया हुआ है 
फिल्म भी शाहरुख़ खान की लगी है 
फर्स्ट डे फर्स्ट शो भी देखना ज़रूरी है .
पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर गाँव है.
अपनी गाड़ी से बस आधे घंटे ,
पर माँ तो इंतजार कर ही रही है ,
उस से मिलना ज़रूरी भी तो नहीं!


काश, मुझे याद रहती - माँ की वो पीड़ा ,
जो उसने मुझे जन्म देते वक़्त 
सही होगी.
उसका वो रातों को जागना ,
जब मुझे हल्की तपिश का बुखार रहा होगा .
उसका मुदित होना -जब, मैं घुटनों पर पहली बार चला था .
और.....और भी ............बहुत कुछ .
पर माँ तो इंतजार कर ही रही है.....................?

3 comments:

वन्दना said...

जीवन की भाग दौड मे हम ये भूल जाते है कि ये वक्त हमारा भी आना है ……………यही सभी की हकीकत है।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

यह बहुत विचारणीय है.....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

रूप जी!
एक ओर यह सच्चाई है तो दूसरी ओर कई अपवाद भी हैं.. पर अधिकता ऐसे ही लोगों की है!! भावुक कर देने वाली प्रस्तुति!!