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Sunday, March 13, 2011

                                                लिखने का उद्देश्य !

ब्लॉग्गिंग की दुनिया में मेरा पदार्पण सं 2008 में हुआ था. तब शायद ब्लोग्स  इतने पॉपुलर नहीं थे . मन में उठते विचारों की अभिव्यक्ति का एक सुगम,सटीक,उपयुक्त व मुफ़ीद ज़रिया लगा था मुझे . कविता तो मैं पहले से करता आ रहा था ,पर तब केवल मेरे कुछ मित्र ही इन्हें सुनते थे, या मुझे जानते थे , पर ब्लॉग्गिंग के माध्यम से अब कई लोगों की टिप्पणियां प्राप्त होती हैं.अच्छा लगता है, जब कोई सराहता है या हौसला -अफजाई होती है. लोग कह्ते भी हैं कि लेखन टिप्पणियों के लिए नहीं होना चाहिए, ठीक भी है, उद्गार तो उद्गार हैं  और इन्हें दर्शाने का कोई आसान माध्यम है . ( यहाँ प्रकाशन के लिए गुटबाजी, पहुँच या मठाधीशी की आवश्यकता नहीं है.),तो फिर टिप्पणियों की चिंता क्यों !  परन्तु यह भी सच है क़ि टिप्पणियों के बाद उत्साह द्विगुणित हो जाता है , और शायद यह  फ़र्ज़  बन जाता है कि टिप्पणीकार को कुछ और भी बताया जाय.
साहित्य की सशक्ति मेरे विचार में यह नही है कि आप कितना उम्दा लिखते हैं , बल्कि इसमें है कि आप कितना उपयोगी लिखते हैं. शब्दों के माध्यम से ही सही , यदि सामाजिक उत्थान हों, संवेदनाओं  को बल मिले , समाज की उपयोगिता व इसके समुचित निर्माण का भान हो सके तो शब्द प्रभावी हैं.
कई बार लोग यह भी कहते हैं - " रूप, जब आप रसायन के शिक्षक  हैं , तब साहित्य के प्रति इतनी अभिरुचि क्यूँ !"  और मैं उन्हें उत्तर देता हूँ.  "रसायन विज्ञान तो प्रयोगशाला तक सीमित है  , परन्तु साहित्य असीमित है, विस्तृत है. रसायन के माध्यम से मैं अपने शिष्यों से रु-ब-रु होता हूँ , जबकि साहित्य के माध्यम से मैं अपने गुरुओं से ! "  और तब मेरे मित्र अनुत्तरित हो जाते हैं .
कई बार कविताओं की श्रेणी पर बात होती है.  कभी रोमांटिक कविताएँ , तो कभी विशुद्ध दार्शनिक .... दरअसल दार्शनिक होना ही सामाजिक होना है , ऐसा मै सोचता हूँ. सच कहूँ तो दर्शन ही जीवन है . शिशु के पहले कदम से उसके अवसान तक जीवन, दर्शन ही तो है . और कविताओं के माध्यम से इसका प्रदर्शन आसान हो जाता है .
आज आभारी हूँ मैं उन अपरिचित मित्रों का ( व्यक्तिगत रूप से ) जिन्होंने मेरे उद्गारों पर टिप्पणियां की हैं या कर रहे हैं.
लिखने के कई कारण होते हैं.पर उनके प्रकाशन का मात्र एक कारण होता है . अधिक से अधिक लोगों तक  उसे पहुँचाना !

 ये चित्र जो उकेरे हैं मैंने कागजों पे 
तुम्हारे ही तो अक्स हैं यार मिरे ! 

विचारों की श्रृंखलाओं को  क्रमबद्ध करने की खूबी नही है शायद मुझमे . जब जो जी में आता है , लिख देता हूँ . कितना उपयोगी है, कितना नही , यह मै नही जानता. कितनो तक पहुंचेंगे मेरे  विचार, कौन कुछेक शब्दों के बाद ही "अगला ब्लॉग " क्लिक करेगा, पर खुद को संतुष्ट करने हेतु यह भी आवश्यक है, कि शब्दों को सहेजकर किसी  एक प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करें. 
ब्लोग्गर्स  की दुनिया में विविधताएँ भी हैं . कुछ खालिस कविताएँ करते हैं , कुछेक यादों के संस्मरण प्रस्तुत करते हैं और कुछ सामाजिक सरोकार व उत्थान की बातें करते हैं . कुछ ऐसे भी हैं जो रोजमर्रा की वस्तुओं पर केन्द्रित होकर कविताएँ करते हैं .
उपयोगिता सभी की है और स्थान भी सभी के निर्धारित हैं. 
फिर ,  जब कभी मै अनचाही टिप्पणियां पढता हूँ तो लगता है , यहाँ भी मठाधीशी, गुटबाजी व लोब्बींग शुरू है , जो औचित्य विहीन  है .  क्या शब्दों के माध्यम से आप सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं.  कभी नहीं. आप तो बस  अपना काम कीजिये .
और वैसे भी , वो कहते हैं न ..
जाकी रही भावना जैसी......

लगता है , लेख कुछ लम्बा हो चला है , तो फिलवक्त .....क्रमश: 

इक आस है पहुंचोगे  तुम भी मकां तक 
बस रहगुजर चलते चलो..बस रहगुजर चलते चलो .......!
 

3 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh said...

इक आस है पहुंचोगे तुम भी मकां तक
बस रहगुजर चलते चलो..बस रहगुजर चलते चलो .......!

इसी हौसले को बनाए रखिए...कारवां खुद-बा-खुद जुड़ता जाएगा...शुभकामनाएं...

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

क्या शब्दों के माध्यम से आप सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं. कभी नहीं. आप तो बस अपना काम कीजिये .

बहुत अर्थपूर्ण बात है..... सतत लेखन की शुभकामनायें

ZEAL said...

लिखने का उद्देश्य जो आपने बताया , उससे पूरी तरह सहमत हूँ।