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Saturday, September 25, 2010

रोटी !

रोटी- बता,कितने इंसानों का खून किया है तूने!
हैवान बनाये कितने,
मासूम बिगडाए कितने 
औ कितनो को सुकून दिया है तूने!


तेरी ही खातिर -
रिश्ते बदलते देखा,
इंसानों को जानवरों का
 मुखौटा पहनते देखा 
फिर भी, रूप तेरा है कितना सुन्दर !
कितनी है नादाँ 
है कितनी भोली,
तूने ही तो अपने लिए,बहनों की इज्ज़त तोली
बता-ये एहसास तो दिया है तूने
की तू मजबूत है बहुत!
बिन तेरे चल नहीं सकता 
ये  जहाँ !
अस्तित्व भी तो खोएगा-हर एक इंसां यहाँ
कितने अस्तित्व, खोने को मजबूर किया है तूने!
रोटी-बता , कितने इंसानों का खून किया है तूने!

5 comments:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आग है आपकी कविता में... मासूम बिगड़ाए शब्द सही नहीं जान पड़ता है..मासूम बिगाड़े सही शब्द है...एक सलाह, कविता पोस्ट करते समय आप फॉन्ट का ध्यान रखें, बड़े फॉन्ट को बोल्ड कर देने से वो भद्दे दिखने लगते हैं, इसलिए फॉन्ट यदि बड़ा रखिए तो उसको बोल्ड मत करें.

गजेन्द्र सिंह said...

शानदार प्रस्तुति .......
बहुत खुबसूरत पंक्तिया है ........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
क्या आप भी थर्मस इस्तेमाल करते है ?

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
कहानी ऐसे बनी– 5, छोड़ झार मुझे डूबन दे !, राजभाषा हिन्दी पर करण समस्तीपुरी की प्रस्तुति, पधारें

soni garg said...

रोटी के बारे में अक्सर काफी कुछ सुना है और आज ये रोटी को पूरी तह से पर्भाषित करती हुई कविता पढ़ कर अच्छा लगा ! एक भावपूर्ण अभी व्यक्ति !

संजय भास्कर said...

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ...,,,,,.माफी चाहता हूँ..


कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
http://sanjaybhaskar.blogspot.com