Pages

Monday, September 27, 2010

क्या नाम दूँ,इसे!

वो चिर-परिचित,चिरनवीन मुस्कान 
तुम्हारे मादक अधरों की,
देखता है,पूनो का चाँद
तुम्हे क्या,खबर नहीं इसकी?


चांदनी,बिछी जाती है
तुम्हारे कोमल पैरों के तले
ये भोलापन,कहाँ से पाया है,
बताओ ना! ये अदाएं हैं किसकी
सांसों की महक -तुम्हारी.
जैसे खिल उठे अगणित चन्दन-वन
अधखिले अंगों का मधुमास!
अधीर होता है, पागल मन.
प्यास बढाती है,
महक,तुम्हारी वेणी की.


आओ ना, 
हाथों मे हाथ लिए,
हम दूर चलें.
मंजिल हो नई,
धूप हो तुम्हारे ,चेहरे का 
छांव हो,तुम्हारे आँचल की !

4 comments:

ZEAL said...

आओ ना,
हाथों मे हाथ लिए,
हम दूर चलें.
मंजिल हो नई,
धूप हो तुम्हारे ,चेहरे का
छांव हो,तुम्हारे आँचल की !

Beautiful !

.

वीना said...

आओ ना,
हाथों मे हाथ लिए,
हम दूर चलें.
मंजिल हो नई,
धूप हो तुम्हारे ,चेहरे का
छांव हो,तुम्हारे आँचल की !
सुंदर रचना...

ओशो रजनीश said...

अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

जाने काशी के बारे में और अपने विचार दे :-
काशी - हिन्दू तीर्थ या गहरी आस्था....

अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये

संजय भास्कर said...

आओ ना,
हाथों मे हाथ लिए,
हम दूर चलें.
मंजिल हो नई,
धूप हो तुम्हारे ,चेहरे का
छांव हो,तुम्हारे आँचल की !

गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...