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Tuesday, December 28, 2010

गाँव की पगडंडियों से गुजरते हुए सूझती है ये कविता, और मन भावुक हो उठता है, उन यादों को समेट कर  दिल के किसी कोने मे अंकित कर लेना चाहता हूँ! चाहता हूँ यह पल यहीं रुक जाय, पर ज़िन्दगी शायद ऐसे मे थम जाएगी, और..............


वो सोंधी सी खुशबू -
जब पानी की फुहारें ,
मेरे खेत की मिट्टी पर पड़ती हैं !
मदहोश कर जाती है-
महकते गुड़ की ख़ुशबू.
जब आंच पर पकते गन्ने का रस -
एक सुरमई रंगत लिए उबलता है !
याद आता है -
माँ का आंचल ,
जब धूप से जले
लाल,अंगार हुए गालों पर फेरती थी वो !
लेती थी बलैयां.
पोंछ देती थी 
सारी तपिश !
और चढ़ता सूरज भी 
जब हार जाता था 
उस आंचल की छांव-घनेरी से !
आज यह वैभव, यह ऐश्वर्य भी फीका है  
जब उन घड़ियों की याद आती है 
और मैं यह सोचता बैठा हूँ 
कोई लौटा दे मेरे -
वो बीते दिन ,
वे स्वर्णिम पल-छिन !

4 comments:

ZEAL said...

आज यह वैभव, यह ऐश्वर्य भी फीका है
जब उन घड़ियों की याद आती है ...

भावुक कर देने वाली प्रस्तुति। ऐसे बहुत से पल होते हैं जिन्हें वापस पा लेने के लिए मन छटपटाता है, लेकिन गुज़रे हुए पल कभी वापस नहीं आते , सिर्फ रुलाते हैं।

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संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गाँव की कच्छी पगडंडियाँ और गुड़ की सोंधी महक ..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

वीना श्रीवास्तव said...

और चढ़ता सूरज भी जब हार जाता था उस आंचल की छांव-घनेरी से !आज यह वैभव, यह ऐश्वर्य भी फीका है...मां का आंचल, मिट्टी की सोंधी महक..बहुत सुंदर चित्रण...

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर विम्ब!
अच्छी प्रस्तुति!