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Monday, August 9, 2010

खुलते बंद कपाट.....

नैनों के बंद कपाट खोल कर देखो....
तुम्हे अपने अक्स मे ही सब नज़र आएगा !
देखो, देव या देखो इब्लीस !
रफ्ता -रफ्ता दीवाना बदल जाएगा
मौसम की गमगीनी का हो गुमा
या हों ख़ुशी की लरज़ती फुहारें....
तुम्हारे ही आगोश के दरम्या
खुदा का हर हुस्न नज़र आएगा।
ऐ यारब , तूने बनाईहै दुनिया ऐसी
की हर शख्स तुझे ही कोसता है,
सच तो ये है किबराबर ही बांटा तूने,
तेरी यादों मे ही परवाना गुज़र जायेगा................... !

1 comment:

Mrs. Asha Joglekar said...

तुम्हे अपने अक्स मे ही सब नज़र आएगा !
देखो, देव या देखो इब्लीस !
Very true.