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Saturday, August 14, 2010

इरादे तुम्हारे ,दिखाऊं तो कैसे!













वादे
जो कल किये थे तुमने,
उन वादों की याद दिलाऊं तो कैसे,
तुम्हे, भूलने की कोशिश-
भूल कर भी, कर पाऊं तो कैसे!

मजबूरियां , तुम्हारी - रोकती हैं तुम्हें
"दिल की धड्कनें बढ़ती जाती हें"
धड़कनों की चाहतें,थमती ही नहीं
इन चाहतों की , शमा ,बुझों तो कैसे!

कल जब चांदनी , छिटक कर आयी थी
पूछा था मुझसे -पता तुम्हारा....
लब पे आया तो था -नाम तुम्हारा,
पर इसे, चांदनी को , बताऊँ तो कैसे!

झोंका,हवा का भी, नाम लेकर तुम्हारा
खुशबू की कसमें , खाता रहा था,
कभी रूठता, कभी खीझता....
खुशबू से इसे , रूबरू -कराऊँ तो कैसे!

वो चितवन-तुम्हारी,इशारों की बातें
भीड़ मे भी, वो तुम्हारा,शरमाना,
पूछते है सब,वो क्या थे इशारे
इरादें -तुम्हारे, दिखाऊं तो कैसे.........!






1 comment:

'उदय' said...

भीड़ मे भी, वो तुम्हारा,शरमाना,
पूछते है सब,वो क्या थे इशारे
... बहुत सुन्दर, बधाई !!!