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Wednesday, October 13, 2010

ये नीर ख़ुशी के, या गम के !

सपनीले नैनों मे तेरे
तिर आई घनघोर घटा  
ये नीर ख़ुशी के, या गम के !

झिलमिल तारे,चटका ये चाँद 
चहुँ और दीप्त है साँझ-विहान 
फिर भींगी क्यों तेरी पलकें !

कलरव करती,मदमाती सरिता 
उत्तुंग शिखर से गिर कर भी 
करती है देखो, मधुर गान
नयना तेरे हैं क्यों छलके !

तुझमे अभिहित है यह सृष्टि 
तू ही तू है है जग की दृष्टि
फिर काहे का गमगीन शमा
सूरज डूबे या चाँद ढलके !

2 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा भाव!

अमिताभ मीत said...

सुन्दर !!