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Wednesday, May 9, 2012

और शाम तलक , दिए बुझ जाते हैं !

मन की बेचैनी का ज़िक्रे -बयाँ अब क्या करें 
तुमसे मिलना भी चाहे है , और दूर जाना भी 
तुम पास हो तो भूल जाते हैं हम ,
कहनी होती हैं न जाने कितनी ही बातें .
तुम ,जब पास नही  होते , तनहाइयों में 
सपनो के महल बनाते हैं .
बिठाते हैं तुम्हे अपने मन - मंदिर में 
पूजा के फूल तुम्हे चढाते हैं !
शायद पहुँच नहीं पाती , श्रद्धा तुम तक 
तभी तो , आज भी तुम्हे पा ना सके हैं हम 
हर सुबह एक नयी उमंग लेकर जगते  हैं 
और शाम तलक , दिए बुझ जाते हैं !

क्या , कुछ ऐसा ही हाल तुम्हारा भी है 
लोग कहते हैं , दिल को दिल से राह होती है 
फिर क्यों नहीं ख्वाब ये सच होते 
बागों में फूल मुस्काते हैं !
जाने कैसा है ये आलम भी 
दीवार पर आरी -तिरछी लकीरों से 
तस्वीर तुम्हरी बनाते हैं 
तस्वीरों से बातें करते हैं ,
तुमसे नहीं कह पाते हैं 
हर सुबह एक नयी उमंग लेकर जगते  हैं 
और शाम तलक , दिए बुझ जाते हैं !

1 comment:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

हर दिन मन नया में द्वन्द ...... सुंदर रचना