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Monday, June 18, 2012

कुछ बिखरे शब्द !

कुछ बूँदें गिरीं हैं फुहारों सी ,
और ज़ेहन पे तारी हैं खुशबू की तरह !

आज फिर से गिला है तुमसे
बारहा प्यार जताने की यूँ कोशिश न करो !

मैंने तो तुमसे सच की गुज़ारिश की थी
ख्वाब तुमने हमारे सजाए ही क्यूँ !

चलो आज फिर से  दुश्मनी कर लें
दोस्तों की फितरत अब रास नहीं आती ! 

2 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मैंने तो तुमसे सच की गुज़ारिश की थी
ख्वाब तुमने हमारे सजाए ही क्यूँ !

मन के स्पष्ट भाव.... अति सुंदर

रूप said...

Thanx