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Monday, April 30, 2012

बारहा टूटे हैं सपने !

बारहा टूटे हैं सपने !
बारहा ठेस लगी है दिल पर ,
ना-समझ फिर भी बाज़ नहीं आता .

उनसे मिलने की ख्वाहिशें लिए बैठा है,
जो हर बार ही फेर लेते हैं नज़रें 
कैसे समझाएं , रास्तें अलग है ,फिर भी 
खुद को ही चोटिल किये बैठा है !

उम्मीदें हर रोज़ बदती जाती हैं
तम्मनाओं की उम्र घटती नहीं लेकिन ,
ख्वाबों के काफिलों से बाहर नहीं आता 
इकरार के इज़हार किये बैठा है .

बारहा टूटे हैं सपने !

2 comments:

रंजना said...

पीड़ा को प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति मिली है आपके शब्दों में..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

गहन अभिव्यक्ति...