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Saturday, April 28, 2012

सच है , कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता !

सच है , 
कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता ,
चाहता है ये दिल , जब तुम पास होते,
खुबसूरत रेशमी एहसास के साये में 
जब हम अपनी कहते , तुम्हारी सुनते
हवाएं जब मदहोश कर रही होंती
तुम्हारे थरथराते होंठ , जब अठखेलियाँ कर रहे होते 
तल्खियाँ ज़िन्दगी की बेज़ार होंती.
 तब, तब केवल तुम और मैं.....!
 रात तो कट जाती है किसी तरह 
पर  दिन , उफ़, दिवा-स्वप्न भी ,
किस कदर कमज़ोर बनाये रहता है .
 चाहता हूँ , भूल जाऊं तुम्हें,      
पर उतने ही याद आते हो तुम .
क्या , तुम्हारे साथ भी ऐसा ही कुछ है ! 
पर नहीं , तुम्हारी बातें !
कहते कुछ और हो , पर 
अर्थ कुछ और ही होता है उनका !
चलो , भूल जायें ,क्या हैं हम, 
कौन सी जिम्मेदारियां हैं हमारी . 
हमें तो बस तुम्हारा साथ अच्छा लगता है .
क्या मुमकिन है तुम्हारे लिए भी 
कुछ ऐसा ही  !
सीमाएं भी , किस कदर , तबाह 
करतीं हैं ,
तुमसे मिलकर ही समझ पाया हूँ . 
ये दिल भी , कभी मेरी सुनता ही नहीं , 
दिमाग समझाने की कोशिश में अनवरत 
लगा रहता है ! 
इसलिए ही शायद ,
कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता !  
 

3 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर .... कोई न कोई कमी तो खलती ही है.....

रूप said...

Thanx Monika ji !

रूप said...
This comment has been removed by the author.