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Saturday, January 15, 2011

               माँ
तेरे आंचल की इस छांव को
कब से रहा था पुकारता
पर कौन था , जो मुझे
तेरी तरह दुलारता !
माँ, शायद आज समझा है
मैंने तेरी चाह को.
अब क्यों रहूँ मैं भ्रमित,
और किसी की राह को !
स्नेह सिक्त आँखें तुम्हारी
ढूंढती हैं हर घड़ी
लाल की एक झलक को
रहती होंगी घंटों खड़ी 
समझ ही पाया है कहाँ 
और क्या समझ भी पायेगा .
ना भी पाकर प्यार तेरा 
प्यार ऐसा पायेगा !
दुःख-कष्ट पीड़ा झेलती 
रहती ललन की याद मे   
आश्रित होती गर कभी
तो तात की फरियाद मे
ठेस जो लगती कभी
पांव  मे उसके  कभी
पीड़ा भी होती कहाँ
दिल मे तेरे, तो तभी
पर किसने दिया है
तेरी कुर्बानियों का सिला
सुनते आयें हैं अब तलक -
बेटे को माँ से है गिला !

1 comment:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

माँ के बिना जीवन अधूरा ही लगता है....... सुंदर रचना