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Sunday, August 8, 2010

चला चल अपनी डगर

कोई साथ नहीं देता
बनता न कोई हमसफ़र
गर, हो ऐसी बात तो
तू चला चल अपनी डगर।
रोड़ो ने तो हमेशा ही
राह रोका किया है ,
तू न आस छोड़ दे
मार कर उन्हें ठोकर,
चला चल अपनी डगर॥
ठेस भी गर लग गई
भूल जा तू ठेस को
सुख जायेगा लहू
घाव का तू ग़म न कर
चला चल अपनी डगर ।
मंजिलों का भी अगर,
कोई आसरा न हो
राह चल अपनी तरह
मंजिलों की न फ़िक्र कर
चला चल अपनी डगर।
कर्मवीरों के लिए ,
झुकता रहा है आसमा
फल की चिंता क्यूँ हो तुझे
तू तो अपना कर्म कर
चला चल अपनी डगर......................



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