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Friday, August 13, 2010

स्पर्श............

स्पर्श, इस बयार का.....
लेती हुई ,मादक अंगड़ाई
बालियाँ ,लहराते खेतों की
सन्देशा प्यार का लेकर आई है।

झूमो, नाचो, गाओ, कि दिल के तार ,
खिल उठें बयार बनकर ।
उड़ेल दो प्यार का सागर ,
बज उठे प्रकृति, लेकर नया श्रृंगार ।

उड़ता आँचल तुम्हारा,
लेता है, अठखेलियाँ .....
लहराता ऐसे, कि थम लेगा बहार सारी
अब तो न रुको, बिखराओ मादक गीत ,मिलाओ सुर .......
तुम भी , बहारों के गीत गाओ ।

आज़ादी

स्वर्णिम आज़ादी का तुम,
सहृदय, उपभोग करो।
आये कभी न पराधीनता ,
ऐसा कोई प्रयोग करो ।

होना , आधीन-`आधुनिकता` के
अनुपयोगी, दुश्कर ,संगीन ,
खुशियाँ -मन की नहीं पाओगे ,
हो जाओगे ,देखो-ग़मगीन।

हे-युवा ह्रदय,
यह विनती है,
संस्कृति-उन्नत करो।
यह विश्व करे गुणगान तुम्हारा,
हर क्षण यह ,प्रयत्न करो।

यह राष्ट्र ,विश्व के मस्तक पर,
एक उच्च ध्वजा , सा लहराए ।
सुख-शांति, समृधि, मैत्री का ,
हम विश्व मे नाम तो कर जाएँ ।

तुम, दास नहीं, तुम -मालिक हो ,
अपने ही कृत्य, सत्कर्मों का
देखो-कुछ ऐसा `कर्म ` करो-
स्वर्णिम गौरव हो , जन्मों का।



Monday, August 9, 2010

खुलते बंद कपाट.....

नैनों के बंद कपाट खोल कर देखो....
तुम्हे अपने अक्स मे ही सब नज़र आएगा !
देखो, देव या देखो इब्लीस !
रफ्ता -रफ्ता दीवाना बदल जाएगा
मौसम की गमगीनी का हो गुमा
या हों ख़ुशी की लरज़ती फुहारें....
तुम्हारे ही आगोश के दरम्या
खुदा का हर हुस्न नज़र आएगा।
ऐ यारब , तूने बनाईहै दुनिया ऐसी
की हर शख्स तुझे ही कोसता है,
सच तो ये है किबराबर ही बांटा तूने,
तेरी यादों मे ही परवाना गुज़र जायेगा................... !

Sunday, August 8, 2010

अब बरसो ना......

अब बरसो ना.......!
नैन भी जड़ हो गए हैं
राह तककर तुम्हारी
क्यों नहीं सुनते प्रभु!
तुम ये मलिन (कठिन) विपदा हमारी ।
हाड़ के ये चाम भी अब -
झूलने लगे हैं,
तुम्हारी तपिश से।
न खेलो आँख-मिचौली
अब तो आओ ! अश्रुपूरित ,
नयन भी अब ,
कोसने लगे हैं तुम्हे।
तुम न यूँ मुख मोड़ लो
नयन के ये द्वार खोलो
ऐसा भी तो नहीं है कि
सक्षम नहीं हैं _हम,
या पुकार ही हमारी -
तुम तक है न पहुँच पाती।
पर जब तुम_
कहे जाते हो _ बंदापरवर !
तो ,क्या नहीं चाहिए तुम्हे_
देखनी-अपने ही बन्दों कि दुर्दशा !
अब तो न यूँ तड़पाओ,
अस्तित्व ही बाकी कहाँ है ,
अब हमारी।
ठोकरों ने ज़माने कि-
झुलसाया है,
अब तुम भी तो न झुलसाओ
आओ न _____
नेह बरसाओ।


चला चल अपनी डगर

कोई साथ नहीं देता
बनता न कोई हमसफ़र
गर, हो ऐसी बात तो
तू चला चल अपनी डगर।
रोड़ो ने तो हमेशा ही
राह रोका किया है ,
तू न आस छोड़ दे
मार कर उन्हें ठोकर,
चला चल अपनी डगर॥
ठेस भी गर लग गई
भूल जा तू ठेस को
सुख जायेगा लहू
घाव का तू ग़म न कर
चला चल अपनी डगर ।
मंजिलों का भी अगर,
कोई आसरा न हो
राह चल अपनी तरह
मंजिलों की न फ़िक्र कर
चला चल अपनी डगर।
कर्मवीरों के लिए ,
झुकता रहा है आसमा
फल की चिंता क्यूँ हो तुझे
तू तो अपना कर्म कर
चला चल अपनी डगर......................



रिमझिम : दो चेहरे

खिड़कियों से झांकते अक्स __
रिमझिम बूंदे बतार की
चिथड़ी धोती से धन्पता
एक बुढ़ापा !
न जाने किन ख्यालों मे है __
ये जहाँ .........
कि खुशहाल हैं हम
सोने कि इस धरा पर ।
पर जो ,
निकाल रहे हैं, सोना .....
इस धरती का -
क्या उन्हें पत्थर भी है ,
उपलब्ध!
एक घर बनाने को ?
क्या लकड़ी _मयस्सर है उन्हें_
बनाने को एक खिड़की
और झाँकने को ________
रिमझिम _बूँदें बहार की.......!

Saturday, August 7, 2010