अब बरसो ना.......!
नैन भी जड़ हो गए हैं
राह तककर तुम्हारी
क्यों नहीं सुनते प्रभु!
तुम ये मलिन (कठिन) विपदा हमारी ।
हाड़ के ये चाम भी अब -
झूलने लगे हैं,
तुम्हारी तपिश से।
न खेलो आँख-मिचौली
अब तो आओ ! अश्रुपूरित ,
नयन भी अब ,
कोसने लगे हैं तुम्हे।
तुम न यूँ मुख मोड़ लो
नयन के ये द्वार खोलो
ऐसा भी तो नहीं है कि
सक्षम नहीं हैं _हम,
या पुकार ही हमारी -
तुम तक है न पहुँच पाती।
पर जब तुम_
कहे जाते हो _ बंदापरवर !
तो ,क्या नहीं चाहिए तुम्हे_
देखनी-अपने ही बन्दों कि दुर्दशा !
अब तो न यूँ तड़पाओ,
अस्तित्व ही बाकी कहाँ है ,
अब हमारी।
ठोकरों ने ज़माने कि-
झुलसाया है,
अब तुम भी तो न झुलसाओ
आओ न _____
नेह बरसाओ।
Sunday, August 8, 2010
चला चल अपनी डगर
कोई साथ नहीं देता
बनता न कोई हमसफ़र
गर, हो ऐसी बात तो
तू चला चल अपनी डगर।
रोड़ो ने तो हमेशा ही
राह रोका किया है ,
तू न आस छोड़ दे
मार कर उन्हें ठोकर,
चला चल अपनी डगर॥
ठेस भी गर लग गई
भूल जा तू ठेस को
सुख जायेगा लहू
घाव का तू ग़म न कर
चला चल अपनी डगर ।
मंजिलों का भी अगर,
कोई आसरा न हो
राह चल अपनी तरह
मंजिलों की न फ़िक्र कर
चला चल अपनी डगर।
कर्मवीरों के लिए ,
झुकता रहा है आसमा
फल की चिंता क्यूँ हो तुझे
तू तो अपना कर्म कर
चला चल अपनी डगर......................
बनता न कोई हमसफ़र
गर, हो ऐसी बात तो
तू चला चल अपनी डगर।
रोड़ो ने तो हमेशा ही
राह रोका किया है ,
तू न आस छोड़ दे
मार कर उन्हें ठोकर,
चला चल अपनी डगर॥
ठेस भी गर लग गई
भूल जा तू ठेस को
सुख जायेगा लहू
घाव का तू ग़म न कर
चला चल अपनी डगर ।
मंजिलों का भी अगर,
कोई आसरा न हो
राह चल अपनी तरह
मंजिलों की न फ़िक्र कर
चला चल अपनी डगर।
कर्मवीरों के लिए ,
झुकता रहा है आसमा
फल की चिंता क्यूँ हो तुझे
तू तो अपना कर्म कर
चला चल अपनी डगर......................
रिमझिम : दो चेहरे
खिड़कियों से झांकते अक्स __
रिमझिम बूंदे बतार की
चिथड़ी धोती से धन्पता
एक बुढ़ापा !
न जाने किन ख्यालों मे है __
ये जहाँ .........
कि खुशहाल हैं हम
सोने कि इस धरा पर ।
पर जो ,
निकाल रहे हैं, सोना .....
इस धरती का -
क्या उन्हें पत्थर भी है ,
उपलब्ध!
एक घर बनाने को ?
क्या लकड़ी _मयस्सर है उन्हें_
बनाने को एक खिड़की
और झाँकने को ________
रिमझिम _बूँदें बहार की.......!
रिमझिम बूंदे बतार की
चिथड़ी धोती से धन्पता
एक बुढ़ापा !
न जाने किन ख्यालों मे है __
ये जहाँ .........
कि खुशहाल हैं हम
सोने कि इस धरा पर ।
पर जो ,
निकाल रहे हैं, सोना .....
इस धरती का -
क्या उन्हें पत्थर भी है ,
उपलब्ध!
एक घर बनाने को ?
क्या लकड़ी _मयस्सर है उन्हें_
बनाने को एक खिड़की
और झाँकने को ________
रिमझिम _बूँदें बहार की.......!
Saturday, August 7, 2010
Thursday, March 11, 2010
लौट आते वो दिन
किताब के सफे पर लिखे
इबारत की तरह
यादों की खिड़की से झांकते पल
वो सुबह का अलसाना
सो माँ का आँचल
फिर सुरमई सुबह मे
धूप के फिसलते कतरों का
करवट लेता तीखापन
सरसों के पीले लहराते फूल
सोंधी सी रसोई का धुआं
लौट आते वो दिन .............................!
खिड़की के पल्ले से ....
घुस आतें हैं वो पल
दिल के दरीचों से
झांकती _ वो भीनी सी
खुश्बुओ से भरी
स्नेहसिक्त आँखें
लौट जाता है मन _ ब़ार -ब़ार
उन खुले वीरानो की अन्ग्रैयों
को छूने को बेताब
तमन्नावों का आंसियाँ
तिनके- तिनके इकट्ठा करता है ________
ब़ार ब़ार थिरक कर
कह उठता है _मन !
मिल जाते वो पल _छिन!
इबारत की तरह
यादों की खिड़की से झांकते पल
वो सुबह का अलसाना
सो माँ का आँचल
फिर सुरमई सुबह मे
धूप के फिसलते कतरों का
करवट लेता तीखापन
सरसों के पीले लहराते फूल
सोंधी सी रसोई का धुआं
लौट आते वो दिन .............................!
खिड़की के पल्ले से ....
घुस आतें हैं वो पल
दिल के दरीचों से
झांकती _ वो भीनी सी
खुश्बुओ से भरी
स्नेहसिक्त आँखें
लौट जाता है मन _ ब़ार -ब़ार
उन खुले वीरानो की अन्ग्रैयों
को छूने को बेताब
तमन्नावों का आंसियाँ
तिनके- तिनके इकट्ठा करता है ________
ब़ार ब़ार थिरक कर
कह उठता है _मन !
मिल जाते वो पल _छिन!
Thursday, March 4, 2010
बहुत दिन हुए
बहुत दिन गए , कुच्छ लिख नहीं पाया लगता है जैसे एक ब्लाक , एक रुकावट सी हो गयी है, जाने भी दें इन रुकावटों से ही नक़ल कर निखरती है ज़िन्दगी .लहरे भी तो चट्टानों का सीना तोड़ कर अपने लिए रह बना लेती है.
Tuesday, August 25, 2009
काफी दिनों के बाद
कई दिनों से कुच्छ लिखा नही , सोचता ही रह गया ब्लॉगर पर जाऊँ या नहीं ! दरअसल मुश्किल तो यह है की लोगों के पास मेरी इन भावनावों का कोई महत्व भी है क्या ? सच्चाईतो यह है की ब्लॉगर कोई पढ़ता ही नही.......
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