किताब के सफे पर लिखे
इबारत की तरह
यादों की खिड़की से झांकते पल
वो सुबह का अलसाना
सो माँ का आँचल
फिर सुरमई सुबह मे
धूप के फिसलते कतरों का
करवट लेता तीखापन
सरसों के पीले लहराते फूल
सोंधी सी रसोई का धुआं
लौट आते वो दिन .............................!
खिड़की के पल्ले से ....
घुस आतें हैं वो पल
दिल के दरीचों से
झांकती _ वो भीनी सी
खुश्बुओ से भरी
स्नेहसिक्त आँखें
लौट जाता है मन _ ब़ार -ब़ार
उन खुले वीरानो की अन्ग्रैयों
को छूने को बेताब
तमन्नावों का आंसियाँ
तिनके- तिनके इकट्ठा करता है ________
ब़ार ब़ार थिरक कर
कह उठता है _मन !
मिल जाते वो पल _छिन!
Thursday, March 11, 2010
Thursday, March 4, 2010
बहुत दिन हुए
बहुत दिन गए , कुच्छ लिख नहीं पाया लगता है जैसे एक ब्लाक , एक रुकावट सी हो गयी है, जाने भी दें इन रुकावटों से ही नक़ल कर निखरती है ज़िन्दगी .लहरे भी तो चट्टानों का सीना तोड़ कर अपने लिए रह बना लेती है.
Tuesday, August 25, 2009
काफी दिनों के बाद
कई दिनों से कुच्छ लिखा नही , सोचता ही रह गया ब्लॉगर पर जाऊँ या नहीं ! दरअसल मुश्किल तो यह है की लोगों के पास मेरी इन भावनावों का कोई महत्व भी है क्या ? सच्चाईतो यह है की ब्लॉगर कोई पढ़ता ही नही.......
Wednesday, January 14, 2009
तराना
तुम्हारे लब पर ये तराना
लगता है जैसे
सपनों के झूले मे , कोई ...........
हसीं नाजनीन ________________
क़यामत की पेंगे मारती हुई ,
अच्छा ये तो बताओ !
ये तराना ____________
जो , तुम गुनगुना रही हो
तुम्हारे प्यार मे पड़ने का सुबूत तो नहीं!
लगता है जैसे
सपनों के झूले मे , कोई ...........
हसीं नाजनीन ________________
क़यामत की पेंगे मारती हुई ,
अच्छा ये तो बताओ !
ये तराना ____________
जो , तुम गुनगुना रही हो
तुम्हारे प्यार मे पड़ने का सुबूत तो नहीं!
Wednesday, September 17, 2008
Monday, September 15, 2008
अब आये हो तुम !
सूख चले जब नीर नदी के ,
ठूंठ पड़ गयीं जब शाखाएं
बंज़र हरीतिमा मे -
कोई नयी आस जगाने
किसको- कब भाए हो तुम,
अब आए हो तुम,-!
तन्हाई जब रास आ गयी
पतझड़ जब बन गए सहारे
ऐसे मे क्यों आए ही तुम
प्यास जगाने, पास हमारे
अब तक ही क्या पाए हो तुम
अब आए हो तुम! ............
सूख गयीं जब सारी फिजायें
धूल उड़ाती हुई हवाएं
ले आईं हैं बस संजीदी
गुम हो गयीं जब सारी घटायें
क्या कभी गुंजाये हो तुम !
अब आये हो तुम !
शाम उदासी का आँचल ओढ़े
सिमट चली है धीरे-धीरे
खुभतीं हैं नीली आँखों मे
धीमी-धीमी जब शहतीरें
जीवन भी हर्षाये हो तुम
अब आये हो तुम !
सूख गयीं जब सारी फिजायें
धूल उड़ाती हुई हवाएं
ले आईं हैं बस संजीदी
गुम हो गयीं जब सारी घटायें
क्या कभी गुंजाये हो तुम !
अब आये हो तुम !
शाम उदासी का आँचल ओढ़े
सिमट चली है धीरे-धीरे
खुभतीं हैं नीली आँखों मे
धीमी-धीमी जब शहतीरें
जीवन भी हर्षाये हो तुम
अब आये हो तुम !
Wednesday, September 10, 2008
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