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Friday, September 3, 2010

तुम पहले ही गर, बता देते !

आए भी__चले भी गए 
खबर हो न पाई .
दावानल से जूझता ही रहा था ये दिल,
तब फिर  तुमने ही दी थी एक बार -
ज़माने की दुहाई ! 
आखिर क्यूँ ---
हर बार ही होता है ऐसा ,
क्या अस्तित्व  की पनप  भी सीमित होती है  !
फिर लो ही क्यूँ, ऐसे कुछ रिश्ते 
खो जाते हैं जो, अँधेरे मे,गुमनामी के
महज़ दिल की तसल्ली को ,
तुम हर बार ऐसा करते हो .
कोई न कोई तो, कहीं न कहीं ,
ठेस पहुँचाता ही है .
ठोकर पत्थर के ही होते हैं-
अब तक तो यही समझा था .
प्यार की मार होगी इतनी गहरी
तुम पहले ही गर, बता देते................!


 

Thursday, September 2, 2010

'आदर्श '

संसार के विधान का-
एक दृश्य यह भी है की,
एक 'आदर्श ' की काट है -
एक दूसरा आदर्श!
पर हम ऐसा  भी तो नहीं कर सकते कि-
इन काट कि खातिर ,
चढ़ा दें इन आदर्शों कि बलि ,
हम पालेंगे आदर्श 
यह जानते हुए भी कि,काट है उसकी-
परन्तु-गर हम चाहे तो, देखे तो,
पाएंगे एक आदर्श को 
एक दूसरे आदर्श के-
समरूप!

तुम --

तुम ----
खिलती कली सी, जूही की   
मदिरा  के छलकते प्याले सी.
तबस्सुम, लबो का तुम्हारा 
'रूप' कविताओं सा तुम्हारा
समर्पित हर लक्ष्य को,
शायद तुम, और केवल तुमही ,
हो सकते हो------साथी मेरे !

Wednesday, September 1, 2010

संपूर्ण

तुम्हारी वाणी -भादो  की उछ्रिन्खलता,
मन मेरा गाने लगा था .
तुम्हारे ह्रदय मे पूर्णता,ढूंढने लगा था मै!
विलीन- पूर्व-मुहूर्त की वो स्मृति ,
नभ के तारे भी जब क्लांत थे ,
तुमने मुझे अभय दिया था!
उच्छवासित आवेग से -काँपा था मेरा मन,
फिर भी पूछा था -मैंने तुमसे
"तुम कितनी समर्पित हो मेरे लिए!"
'संपूर्ण'_तुमने कहा था ,
ऐसी पूर्णता,किसी ने न दी थी मुझे,
मैं रो पड़ा था !

मै हूँ !

सखा मेरे ,
मुझे पाओगे तुम-नग्न शिशुओं की भीड़ मे ,
मैं वहीँ हूँ ! 
प्रेम के मंदिर मे,तूफ़ानो के परिचित जगत मे,
प्रतिदिन तुम्हारे व मेरे-
सुखी दिनों के पास आके खड़ा !
यदि थोड़ी सी उमंगों की बयार -
चमक लाये , लगे तन पर,
बाद उसके खोकर अनाम -
मरुस्थल मे!
कालवैशाखी की चोट खाकर,
फट पड़े शिउली की मानिंद ,
पाओगे मुझे ,साथी मेरे-
मैं वहीँ हूँ!
वाकिफ़ हैं,तू इस राह नहीं आएगी,
फिर भी जाने क्यूँ ,दर पर आस लगाये बैठे हैं !.........

कुसूर अपना

पूछेंगे तुमसे कुसूर अपना -गर कहीं मिलोगे तुम!
खामियां गिनवायेंगे हम अपनी,
हमें तो यही लगा था ,पूजा किये पत्थर की -
फूल चढ़ाये  गलत चौतरे पर.
काश, समझ पाए होते पहले हम-
तुम वो नहीं, जिसकी मूरत सजाई थी कभी हमने-
अपने मन-मंदिर मे .
पर- इतना तो यकीं है ,हमें भी,
कभी  न कभी  -याद हमारी तुम्हे भी आएगी,
तद्पोगे तुम  भी उन -लम्हातों को याद कर-
पछताओगे  तुम  भी कभी खो कर हमें.
तड़प रहेगी ,तुम्हे -हमारे लौट कर आने की 
पर लौट कर कभी-आ न पाओगे!