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Wednesday, March 21, 2012

एक भूली सी याद !



भूलती नहीं तेरी वो मनोहारी सूरत !
कलकत्ते में बस की खिड़की से देखा था जो ,
आयी नहीं , सपने में भी कभी , ऐसी अनिंध्य सुंदरी
दिल के तारों को धड़का सके जो !
आज, जब उम्र के तीसरे पड़ाव पर हूँ मैं ,
सुविधा-संपन्न ज़िन्दगी , जिसके पांव चूमती है
सामाजिक हैसियत भी, जिसे कहते हैं लोग
कुछ कम नहीं है फिर भी ,
भूलती नहीं , तेरी वो देह-यष्टि
तेरी अनमोल काया -
तू, जो भी थी,
 तू, जो भी है
तू, जहाँ कहीं भी है
तू, जैसी कहीं भी है !
मेरा प्रणय-निवेदन तुझ तक पंहुचा ,गर
उसे स्वीकार कर लेना !
मुझे कृतार्थ कर देना !
यह निवेदन , 'दान्ते'  के 'बीट्रिस' की
तरह तो नही ,
फिर भी, तू यदि इसे समझ सके
तो,
इसे 'पूजा के फूल' के सदृश
स्वीकार कर लेना !
मुझे कृतार्थ कर देना !

Saturday, January 7, 2012

गर खुद को लुटाये होते ..!

नैनों की भाषा गर समझ पाए होते
जीवन को तुम भी हसीं बनाये होते
ये जो दिमाग आड़े आता रहा तुम्हारे
दिल से सोचा होता , तो मुस्कुराये होते ...!
चलते-चलते राह में ,कई साथी मिले ,
कुछ राह में ही रह गए , कुछ हमराज़ बने
दिया कुछ थोडा सा , पाया हमने इन्तहा
खुश होते बहुत,गर खुद को लुटाये होते ..!



Sunday, December 18, 2011

कई बार दिल ने चाहा
मजलिसों के हमराह न हों 
पर ख्वाहिशें कुछ ऐसी बढीं 
हम बारहा मजलिस हुए   !

Sunday, December 11, 2011

ख्वाहिश !

कोई रोज़ आता है , सपनो में मेरे
चुपके से कानो में कह जाता है ,
ढेर सी बातें
बातें , जो बेमानी नहीं होतीं
बातें , जिनका सरोकार होता है ,
जीवन की तल्खियों से , खुशिओं से
रुसवाइयों से ,शहनाइयों से
बातें ,जो कह जातीं हैं,
चुपके से कानो में
कल आएगा , एक दिन ऐसा
पूरे होंगें, ख्वाब तुम्हारे
सपना सच हो जायेगा
नए समाज की सादगी,
अठखेलियों में.
सपना , तुम्हारा  मुस्कुराएगा  !

Wednesday, December 7, 2011

बीत गया !

एक और बरस बीत गया 
जीवन घट रीत गया 
साथी और मंजिल यूँ ही मिलते गए 
संकट -विकट कट ,पीट गया 
चाहा था छूना आसमान मैंने भी  
कुछ पहुँच पाया , कुछ गीत गया 
मेरा तो कुछ भी अपना न था 
जो तुमने दिया वह मीत नया  !
मेरे मन की पीड़ा हर ली 
संग तुम्हरे , पल नवनीत नया .
एक और बरस बीत गया 
जीवन घट रीत गया !

Wednesday, November 9, 2011

चार दृश्य !

                      दृश्य -१
अब तो सुविधा संपन्न है जिंदगी !
मम्मी की आँखों में पानी है,
"बालिका बधू "की दुर्दशा देखकर 
कोसे जा रहीं हैं 'जगया' और 'माँ सा' को 
बेटा पिछले कमरे से चिल्लाये जा रहा है 
शायद किसी कीड़े ने काट खाया है उसे !
                     दृश्य -२
कल रात  की सब्जी फ्रिज से निकाली गयी है  
पति महोदय नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं 
शायद फंफूद लग गई है सब्जी में 
पत्नी का तीखा स्वर 
फ्रिज चलाने का क्या मतलब
जब चीज़ें ही न रखी जाय उसमे 

                   दृश्य -३
बेटी रुआंसी होकर स्कूल से लौटी है 
आज मैडम ने बड़ी इन्सल्ट की थी 
होम वर्क पूरा नही हो पाया 
कैसे करूँ मम्मी 
डांस क्लास्सेज,फिर गिटार
और 
कल वो शाहरुख़ की फिल्म भी तो 
आ रही थी टी.वी पर !
                   दृश्य -४
मुहल्ले  में कुछ चार-पांच लोग इकठ्ठा हैं 
चर्चा चल रही है इस बार के गणपति-उत्सव पर
कितने गरीब बच्चों को भोजन-कपडे करवाना है 
शर्मा जी ,फेसबुक  पर डटे 
फ्रेंड्स रिकुएस्ट भेजकर संख्या बढ़ा रहे हैं 


बाकी आपके  लिए छोड़े दे रहा हूँ , वैसे और भी है पर, इतने का ही मनन करें ................और .............!

Sunday, November 6, 2011

यूँ न इठलाओ !

मदहोश हवाओं में यूँ न फैलाओ आँचल 
बादलों के बरसने का अंदेशा हो जायेगा  !
रुखसार की लाली , इन्द्रधनुष का देती है गुमां  
बेहोश जवानी को मचलने का अरमां हो जायेगा !
गुनगुनाती वादियाँ हैं  , महकती  है ये फ़िज़ा 
यूँ न इठलाओ , धरा  को भी बहारा-जश्न हो जायेगा !
कायनात रंग बदलने को लगती है आतुर 
ज़ुल्फे -इकरार को  भी बयार का गुमां हो जायेगा !