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Tuesday, August 2, 2011

हरजाई !

सावन के झूलों में 
पींगे पिया के याद की समाई हैं 
तुम आओ ना,रिमझिम की झड़ी 
तुम्हारे प्यारे  स्पर्श का संदेशा तो ले आईं हैं !

नयन राह तकते हैं ,
झोंके बयार के मादक लगते हैं 
ऐसे में जब गूंजती है प्यार की शहनाई 
पिया ,नस-नस में एक हुलास सी ले आई है 

सखियाँ जब करती हैं रात की बातें 
गुजारी बाँहों में सौगात की बातें 
तुम्हारे स्नेहिल-स्पर्श की  यादें
मेरे दिल की धडकने देती हैं दुहाई 
लेती हैं नाम तुम्हारा ,  कहती हरजाई हैं 

तुम आओ ना ,रिमझिम की झड़ी 
तुम्हारे प्यारे स्पर्श का संदेशा तो ले आयीं हैं !


Monday, August 1, 2011

किस्मत !


 शायद पता  नहीं  तुम्हे 
कई बार अश्क जो सूख जाते हैं, 
गालों पर लकीर जैसे  
एक पूरी कहानी का सामां होते हैं ,
छुपी होती है उन लकीरों में ,
पेट की बे-बसी .
छत से टपकते बूंदों की त्रासदी !
हरियाली नहीं भाती , उन्हें 
तुम्हारी तरह, नही निहारते , वे
खूबसूरत तस्वीरें. लहराती वादियाँ,
उन्हें तो धरती भी गोल है, इसका नहीं पता .
रोटी की सोंधी खुशबू का एहसास नहीं होता ,उन्हें .
उन्हें तो बस ,पता है भूख.
जिसे  उन सूख चुकी लकीरों से कभी-कभी
बुझा लिया करते हैं. 
बड़े गेट के अंदर की रंगीनीयों  ,
का भान नहीं होता उन्हें .
वे  तो बस , ताक में रहते हैं ,
कब  कुत्ते के हाथ लगी रोटी,
उनके कब्ज़े में आ जाय . 
और एक  पार्टी , आज उनके  भी 
नसीब का हमसफर हो !

Thursday, July 28, 2011

कोई बताये हमें !


कल  तक  जो  हमसाया था मेरा 
आज पास आने से भी कतराता है
क्यूँ होता है ऐसा , कोई बताये हमें !
क्यूँ ये प्यार समय में सिमट जाता है !  

क्यूँ हसरतें रह जातीं हैं अधूरी
क्यों दिल ये तनहा हो जाता है !
तमन्नाएँ , आरज़ूओं  की ख़लिश बढ़ातीं हैं 
क्यूँ कोई गूंथ के बिखर जाता है !

यारब तूने गढ़ें हैं खेल ये कैसे ?
रचा ये कैसा तमाशा है 
जब प्यार मंजिल  का एहसास पाने लगता है 
दिल ये  टूट  के बिखर जाता है !

Wednesday, July 27, 2011

बे -वज़ह


चलो, कुछ तुम कहो,कुछ हम  कहें
गुजर जायेंगे ये लम्हात यूँ ही 
आशियाँ मुहब्बत के रोशन होते रहेंगे 
जब दीदारे -यार चश्मनशीं  होगा !
ख्वाहिशें पूरी हों कि न हों 
दामन तुम्हारा कभी न छोड़ेंगे 
रहगुजर साथ रहेंगे हम तुम्हारे 
ख्वाहिशों कि बरसात न छोड़ेंगे 
बुनते रहेंगें सामां,अपनी बरबादियों का !
जश्ने-बहारां के हसरात न छोड़ेंगे !

Tuesday, June 28, 2011

अनायास ही !

टकटकी लगाये हुए देखता हूँ तुम्हे 
महसूसता हूँ कंपन तुम्हारे लबों का !
तुम्हारे काजल की धार 
तुम्हारे फड़कते अभ्र 
कितना  खुशनसीब हूँ मैं ,
जो तुम्हे पाया है ----------
"उम्र ढ़लती जाती है 
बुढ़ापा देने लगा है दस्तक 
चांदी की चमक -
झाँकने  लगी है बालों में "
तुम कहती हो .

मुझे लगता है -
और भी खूबसूरत हो गयी हो तुम !

तुम्हारे नक्श आज भी ,
इक अंगड़ाई का कारण है .
स्मित तुम्हारा -
एक मादक संगीत का दस्तक !
तहाते हुए मेरे कपडे 
सजाते हुए मेरी थाली 
और-
कभी हिचकी लेते ही दौड़ना -
पानी के ग्लास के लिए !
तुम कितनी अच्छी हो !

छोड़ आई अपनी देहरी 
जहाँ गुड़ियों के लिए कभी -
सहेजती थीं कपड़े !
लगाती थीं 
बालों में महकता फ़ूल!
आज देखता हूँ तुम्हे-
सहेजते हुए घर की तक !
सजाते हुए 
दरवाज़े पर एक रंगोली !
तुम कितनी खुबसूरत हो !

मेरे ये शब्द ,
क्या कभी -
देंगे तसल्ली 
तुम्हे !
क्या समझ पोगी तुम 
कितनी कसक उठती है 
तुम्हारा साथ, तुम्हारा स्पर्श पाने को !
आज शब्दों के ताने-बाने
बुनकर "अनायास ही "!
तुम कितनी खुबसूरत हो !

Monday, May 2, 2011

चलो चाँद छू आयें !

दिल ने कहा-चलो चाँद छू आयें 
चाहे ,जितनी भी अड़चने आयें 
शीतल-मृदुल चाँद का स्पर्श 
पाकर क्यों न हम खिल जायें 
दूरी का भी क्या ग़म करना 
जब मंजिल पर ताक लगायें 
चलते जायें , बिना हिचक के 
मंजिल को हासिल कर पाएं 
छोटी-छोटी आशाएं हैं .
छोटे-छोटे ही हैं सपने 
इन सपनो को पालेंगे गर 
तभी स्वप्न साकार हो पाएं  

दिल ने कहा-चलो चाँद छू आयें 
 चाहे ,जितनी भी अड़चने आयें !

Sunday, May 1, 2011

औ भगवन हम तक भी आएगा !

आज दिवस है उन लोगों का !
जिन्हें न उनका भान है .
सारा दिन तपती धरती पर
मिला कहाँ विश्राम है !
तुम कहते हो बदलो किस्मत !
तुम्ही ठोकरें देते हो .
जब भी माँगा है हक अपना .
विष-वमन ,तुम्ही कर देते हो. 
तुमसे  अच्छा  तो विषधर है ,
मेरा सहभागी रहता है 
जब तक न उसे छेड़ा जाये 
साथी ही साथी रहता है !
सारे सपने साकार किये 
तुम पर हमने उपकार किये 
पर कैसे इन्सां हो तुम महलों के 
हम पर बस तुम प्रहार किये !
कब तक कुचलोगे , रौंदोगे
कब तक हम सबको सौदोगे 
एक दिन ऐसा भी आएगा 
जमीर हमारा जाग जायेगा 
और जिन्हें पूजते हो महलों में 
वो भी हमसे घबराएगा .
अब तक वो रहा तुम्हारे दर
तुम्हे छोड़ के जायेगा !
इम्तहान होगा फिर ख़त्म 
औ भगवन हम तक भी आएगा !